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________________ २५६ मूलाचारअध्रुवमशरणमेकत्वं अन्यत्संसारलोकं अशुचित्वं । ' आस्रवसंवरनिर्जराधर्म बोधि च चिंतयेत् ॥ ६९२ ॥ अर्थ-अनित्य अशरण एकत्व अन्यत्व संसार लोक अशुचित्व आस्रव संवर निर्जरा धर्म बोधि-इन बारह अनुप्रेक्षाओंका ( भावनाओंका ) चितवन करे ॥ ६९२ ॥ ठाणाणि आसणाणि य देवासुरमणुयइड्डिसोक्खाई। मादुपिदुसयणसंवासदाय पीदीवि य अणिचा॥६९३।। स्थानानि आसनानि च देवासुरमनुजऋद्धिसौख्यानि । मातृपितृस्वजनसंवासता प्रीत्यपि च अनित्या ॥ ६९३ ॥ अर्थ-प्रामादि स्थान सिंहासनादि आसन देव असुर मनुष्य इनकी हाथी घोड़ा आदि विभूति इंद्रियसुख, माता पिता बांधव सहित एक जगह रहना और इनके साथ प्रीति-ये सब अनित्य हैं ॥ ६९३ ॥ सामग्गिदियरूवं मदिजोवणजीवियं बलं तेजं । गिहसयणासणभंडादिया अणिञ्चेति चिंतिजो॥६९४॥ सामग्रींद्रियरूपं मतियौवनजीवितं बलं तेजः।। गृहशयनासनभांडादीनि अनित्यानीति चिंतयेत् ॥ ६९४॥ अर्थ-राज्य हाथी घोड़े, नेत्रादि इंद्रिय, गोरा काला वर्ण, बुद्धि, जवान अवस्था, जीवन, बल, कांति व प्रताप, घर स्त्री शय्या सिंहासन वस्त्र वर्तन आदि सभी अनित्य हैं ऐसा चितवन करे ॥ ६९४ ॥ आगे अशरणभावनाको कहते हैं;हयगयरहणरबलवाहणाणि मंतोसधाणि विजाओ।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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