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________________ षडावश्यकाधिकार ७। २४१ आगे चारप्रकारके आहारका खरूप कहते हैंअसणं खुहप्पसमणं पाणाणमणुग्गहं तहा पाणं । खादंति खादियं पुण सादंति सादियं भणियं॥६४४॥ अशनं क्षुधाप्रशमनं प्राणानामनुग्रहं तथा पानं । खाद्यते खाद्यं पुनः स्वाद्यते स्वाद्यं भणितं ॥ ६४४॥ अर्थ-जिससे भूख मिट जाय वह अशन है, जिससे दस प्राणोंका उपकार हो वह पान है, जो खाया जाय वह लाडू आदि खाद्य है, और जिससे मुखका खाद किया जाय इलाइची आदि खाद्य कहा है ॥ ६४४ ॥ सव्वोपि य आहारो असणं सव्वोवि वुचदे पाणं । सव्वोवि खादियं पुण सव्वोवि य सादियं भणियं॥६४५ सर्वोपि च आहारः अशनं सर्वोपि उच्यते पानं । सर्वोपि खाद्यं पुनः सर्वोपि च स्वाद्यं भणितं ॥ ६४५ ॥ अर्थ—सभी आहार अशन है सभी पान कहा जाता है सभी खाद्य है और सभी खाद्य कहा गया है यह द्रव्यार्थिककी . अपेक्षा कहा है ॥ ६४५ ॥ असणं पाणं तह खादियं चउत्थं च सादियं भणियं। एवं परूविदं दु सद्दहिदुंजे सुही होदि ॥ ६४६ ॥ अशनं पानं तथा खाद्यं चतुर्थ च खाद्यं भणितं । एवं प्ररूपितं तु श्रद्धाय सुखी भवति ॥ ६४६ ॥ अर्थ-इसप्रकार अशन पान खाद्य और चौथा खाद्य भेदकर आहार कहा उसको श्रद्धानकर जीव सुखी होता है ॥ ६४६ ॥ पच्चक्खाणणिजुत्ती एसा कहिया मए समासेण । १६ मूला.
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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