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________________ षडावश्यकाधिकार ७। २३९ पच्चक्खाणवियप्पा णित्तिजुत्ता जिणमदमि ॥६३८॥ अनागतमतिक्रांतं कोटीसहितं निखंडितं चैव। . साकारमनाकारं परिमाणगदं अपरिशेष ॥ ६३७ ॥ अध्वानगतं नवमं दशमं तु सहेतुकं विजानीहि । प्रत्याख्यानविकल्पा निरुक्तियुक्ता जिनमते ॥ ६३८ ॥ अर्थ-भविष्यत् कालमें उपवास आदि करना जैसे चौदसका उपवास तेरसको, वह अनागत प्रत्याख्यान है । अतिक्रांत कोटीसहित, निखंडित, साकार, अनाकार, परिमाणगत, अपरिशेष प्रत्याख्यान, नौमा अध्वगत, दसवां सहेतुक प्रत्याख्यान है। इस प्रकार सार्थक प्रत्याख्यानके दस भेद जिनमतमें जानना चाहिये ॥ ६३७-६३८ ॥ विणए तहाणुभासा हवदिय अणुपालणाय परिणामें। एवं पञ्चक्खाणं चदुविधं होदि णादव्वं ॥ ६३९ ॥ विनयेन तथानुभाषया भवति च अनुपालनेन परिणामेन। एतत् प्रत्याख्यानं चतुर्विधं भवति ज्ञातव्यं ॥ ६३९ ॥ अर्थ-विनयकर अनुभाषाकर अनुपालनकर परिणामकर शुद्ध यह प्रत्याख्यान चारप्रकार भी है ऐसा जानना ॥ ६३९ ॥ किदियम्म उवचारिय विणओ तह णाणदंसणचरित्ते। पंचविधविणयजुत्तं विणयसुद्धं हवदि तं तु ॥ ६४०॥ कृतिकर्म औपचारिकः विनयः तथा ज्ञानदर्शनचारित्रे । पंचविधविनययुक्तं विनयशुद्धं भवति तत्तु ॥ ६४०॥ अर्थ-सिद्धभक्ति आदि सहित कायोत्सर्ग तपरूप विनय, व्यवहारविनय, ज्ञानविनय दर्शनविनय चारित्रविनय-इसतरह
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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