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________________ षडावश्यकाधिकार ७। २३३ कृत्वा च कृतिकर्म प्रतिलेख्य अंजलीकरणशुद्धः। आलोचयेत् सुविहितः गौरवं मानं च मुक्त्वा ॥ ६१८ ॥ अर्थ-विनयकर्म करके, शरीर आसनको पीछी व नेत्रसे शुद्ध करके, अंजलिक्रियामें शुद्ध हुआ निर्मल प्रवृत्तिवाला साधु ऋद्धि आदि गौरव और जाति आदिके मानको छोड़कर गुरुसे अपने अपराधोंका निवेदन करे ॥ ६१८ ॥ आलोचणं दिवसियं रादिअ इरियावधं च बोधव्वं । पक्खिय चादुम्मासिय संवच्छरमुत्तमटुं च ॥ ६१९ ॥ आलोचनं दैवसिकं रात्रिक ईर्यापथं च बोद्धव्यं । पाक्षिकं चातुर्मासिकं सांवत्सरिकमुत्तमार्थ च ॥ ६१९ ॥ अर्थ-गुरुके समीप अपराधका कहना वह आलोचना है। वह दैवसिक रात्रिक ईर्यापथिक पाक्षिक चतुर्मासिक संवत्सरिक उत्तमार्थ-इसतरह सातप्रकारका जानना चाहिये ॥ ६१९॥ अणाभोगकिदं कम्मं जं किंवि मणसा कदं । तं सव्वं आलोचेजहु अव्वाखित्तेण चेदसा ॥६२०॥ अनाभोगकृतं कर्म यत् किमपि मनसा कृतं । तत् सर्व आलोचयेत् अव्याक्षिप्तेन चेतसा ॥ ६२० ॥ अर्थ-अन्यको नहीं मालूम ऐसा अनाभोगरूप किया गया अतीचार, जो कुछ मनसे किया गया कर्म उस सबको निराकुलचित्तसे गुरुके सामने आलोचन ( निवेदन ) करे ॥ ६२० ॥ आलोचणमालुंचण विगडीकरणं च भावसुद्धी दु। आलोचिदह्मि आराधणा अणालोचणे भज्जा ॥६२१॥ आलोचनमालुचनं विकृतिकरणं च भावशुद्धिस्तु ।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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