SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 263
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २२६ - मूलाचार आचरणमें दृढ हो, ध्यान अध्ययनमें लीन हो, अहिंसादि पांच महाव्रतोंकर सहित हो, असंयमसे ग्लानि रखनेवाला हो और वीर्यवान् हो ॥ ५९५ ॥ दसणणाणचरित्ते तवविणए णिच्चकालमुवजुत्ता। एदे खु वंदणिज्जा जे गुणवादी गुणधराणं ॥५९६ ॥ दर्शनज्ञानचारित्रे तपोविनयेषु नित्यकालमुपयुक्ताः । एते खलु वंदनीया ये गुणवादिनः गुणधराणाम् ॥५९६॥ अर्थ-दर्शन ज्ञान चारित्र तपविनयमें सदाकाल लीन हों और शीलादिगुणधारकोंके गुणोंको कहनेवाले हों वे निश्चयकर वंदने योग्य हैं ॥ ५९६ ॥ वाखितपराहुतं तु पमत्तं मा कदाइ वंदिजो। आहारं च करंतो णीहारं वा जदि करेदि ॥ ५९७ ॥ व्याक्षिप्तपरावृत्तं तु प्रमत्तं मा कदाचित् वंदेत । आहारं च कुर्वतं नीहारं वा यदि करोति ॥ ५९७ ॥ अर्थ-व्याख्यानादिसे आकुल चित्तवाला दूर रहनेवाला निद्रा विकथादिमें लीन तथा भोजनादि कर रहा हो मलमूत्रादि शौचक्रिया कर रहा हो ऐसी अवस्थावालेको वंदना नहीं करनी चाहिये। आसणे आसणत्थं च उवसंतं च उवहिदं । अणुविण्णय मेधावी किदियम्मं पउंजदे ॥ ५९८ ॥ आसने आसनस्थं च उपशांतं च उपस्थितं । अनुविज्ञप्य मेधावी कृतिकर्म प्रयुक्ते ॥ ५९८ ॥ - अर्थ-एकांत भूमिमें पद्मासनादिसे तिष्ठते हुए स्वस्थचित्त
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy