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________________ षडावश्यकाधिकार ७ । अव्वाखित्तो वुत्तो कुणदिय चउवीसथोत्तयं भिक्खू चतुरंगुलांतरपादः प्रतिलेख्यः अंजलीकृतप्रशस्तः । अव्याक्षिप्त उक्तः करोति च चतुर्विंशतिस्तोत्रं भिक्षुः॥५७३ अर्थ-जिसने पैरोंका अंतर चार अंगुल किया हो, शरीर भूमि चित्तको जिसने शुद्ध कर लिया हो, अंजलिको करनेसे सौम्य भाववाला हो, सब व्यापारोंसे रहित हो ऐसा संयमी मुनि चौवीसतीर्थकरोंकी स्तुति करै ॥ ५७३ ॥ चउवीसयणिज्जत्ती एसा कहिया मए समासेण । वंदणणिज्जुत्ती पुण एतो उ8 पवक्खामि ॥ ५७४ ॥ चतुर्विंशतिनियुक्तिः एषा कथिता मया समासेन । वंदनानियुक्तिं पुनः इत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि ॥ ५७४ ॥ अर्थ—मैंने यह चतुर्विंशतिस्तवनियुक्ति संक्षेपसे कही है अब इससे आगे वंदना नियुक्तिको कहता हूं ॥ ५७४ ॥ णामट्ठवणा व्वे खेत्ते काले य होदि भावे य । एसो खलु वंदणगे णिक्खेवो छविहोणेओ॥५७५॥ नाम स्थापना द्रव्यं क्षेत्रं कालश्च भवति भावश्च । एष खलु वंदनाया निक्षेपः पविधो ज्ञेयः ॥ ५७५ ॥ अर्थ-नामवंदना, स्थापना, द्रव्य क्षेत्र काल भाव-इसतरह वंदनाका निक्षेप छह प्रकारका है ऐसा जानना ॥ ५७५ ॥ किदियम्मं चिदियम्मं पूयाकम्मं च विणयकम्मं च । कादव्वं केण कस्स व कथं व कहिं व कदिखुत्तो॥५७६ कदि ओणदं कदि सिरं कदिए आवत्तगेहिं परिसुद्धं । कदिदोसविप्पमुक्कं किदियम्मं होदि कादव्वं ॥ ५७७॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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