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________________ २१० मूलाचारनामानि यानि कानिचित् शुभाशुभानि लोके। नामलोकं विजानीहि अनंतजिनदर्शितं ॥ ५४२ ॥ अर्थ-इस लोकमें जितने कुछ शुभ अशुभ नाम हैं उनको नामलोक जानो ऐसा अविनाशी जिनभगवानने उपदेश किया है। ठविदं ठाविदं चावि जं किंचि अत्थि लोगमि। ठवणालोगं वियाणाहि अणंतजिणदेसिदं ॥ ५४३ ॥ स्थितं स्थापितं चापि यत् किंचिदस्ति लोके । स्थापनालोकं विजानीहि अनंतजिनदेशितं ॥ ५४३॥ अर्थ-अकृत्रिम और कृत्रिम रूप जो कुछ इस लोकमें विद्यमान है वह स्थापना लोक है ऐसा अविनाशी जिनभगवानका उपदेश है ॥ ५४३ ॥ जीवाजीवं रूवारूवं सपदेसमपदेसं च । दव्वलोगं वियाणाहि अणंतजिणदेसिदं ॥५४४ ॥ जीवाजीवं रूप्यरूपि सप्रदेशमप्रदेशं च । द्रव्यलोकं विजानीहि अनंतजिनदेशितं ॥ ५४४ ॥ अर्थ-चेतन अचेतन रूपी अरूपी सप्रदेश अप्रदेश जितने द्रव्य हैं उसे द्रव्यलोक जानना ऐसा जिनेंद्रदेवने कहा है ॥५४४॥ परिणाम जीव मुत्तं सपदेसं एकखेत्त किरिआ य । णिचं कारण कत्ता सव्वगदिदरह्मि अपवेसो॥५४५॥ परिणामि जीवो मूर्त सप्रदेशं एकक्षेत्रं क्रियावत् च । नित्यः कारणं कतो सर्वगत इतरस्मिन् अप्रवेशः ॥५४५॥ अर्थ-इन द्रव्योंमें परिणामी चेतन मूर्त सप्रदेश एकक्षेत्र
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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