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________________ २०८ मूलाचारअर्थ-जिसने अंजलि और हाथोंको शुद्धकर लिया है सावधानता सहित है जिसका एकाग्र चित्त है जो आकुलतारहित है ऐसा साधु उठ खडा होकर आगमकथित विधिसे सामायिकको करे ॥ ५३६ ॥ __ आगे चतुर्विंशतिस्तव कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं;सामाइयणिज्जुत्ती एसा कहिया मए समासेण । चउवीसयणिजुत्ती एतो उ8 पवक्खामि ॥५३७॥ सामायिकनियुक्तिः एषा कथिता मया समासेन । चतुर्विंशतिनियुक्तिं इत ऊर्व प्रवक्ष्यामि ॥ ५३७॥ अर्थ-मैंने यह सामायिकनियुक्ति संक्षेपसे कही । अब इससे आगे चतुर्विशतिस्तव नियुक्तिको कहता हूं ॥ ५३७ ॥ णामट्ठवणा दव्वे खेत्ते काले य होदि भावे य। एसो थवह्मि णेओ णिक्खेवो छविहो होइ ॥५३८॥ नाम स्थापना द्रव्यं क्षेत्रं कालश्च भवति भावश्च । एष स्तवे ज्ञेयो निक्षेपः षविधो भवति ॥ ५३८॥ अर्थ-नामस्तव स्थापनास्तव द्रव्यस्तव क्षेत्रस्तव कालस्तव भावखव-इसप्रकार चौविसतीथैकरोंके स्तवनके छह भेद हैं। नामोंकी तुति नामस्तव है इत्यादि अन्य भी इसीतरह जानना ॥ ५३८ ॥ ___ अब स्तुति करनेकी रीति बतलाते हैं;लोगुजोरा धम्मतित्थयरे जिणवरे य अरहंते । कित्तण केवलिमेव य उत्तमबोहिं मम दिसंतु ॥५३९॥ लोकोद्योतकरा धर्मतीर्थकरा जिनवराच अर्हतः। कीर्तनीयाः केवलिन एवं च उत्तमबोधि मह्यं दिशतु॥५३९॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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