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________________ २०६ मूलाचार सावद्ययोगपरिवर्जनार्थ सामायिकं केवलिमिः प्रशस्तं । . गृहस्थधर्मोऽपरम इति ज्ञात्वा कुर्यात् बुधः आत्महितं प्रशस्तं५३० अर्थ-केवली भगवानने पापासव रोकनकेलिये सामायिकको कहा है । गृहस्थधर्म आरंभसहित होनेसे जघन्य कहा है। ऐसा जानकर ज्ञानी आत्माका हित करनेवाले सामायिकको करैं ॥५३० सामाइयनि दु कदे समणो इर सावओ हवदि जला। एदेण कारणेण दु बहुसो सामाइयं कुज्जा ॥५३१॥ सामायिके तु कृते श्रमणः किल श्रावको भवति यसात् । एतेन कारणेन तु बहुशः सामायिकं कुर्यात् ॥ ५३१॥ अर्थ-सामायिक करता हुआ श्रावक भी संयमी मुनिके समान होजाता है इसलिये बहुत करके सामायिक करना चाहिये ॥ ५३१ ॥ सामाइए कदे सावएण विद्धो मओ अरण्णमि। सोय मओ उद्धादो ण य सोसामाइयं फिडिओ॥५३२ सामायिके कृते श्रावकेण विद्धो मृगः अरण्ये । स च मृगः उद्धतः न च स सामायिकं स्फेटितवान् ॥५३२॥ अर्थ-किसी श्रावकने वनमें सामायिक करना आरंभ किया ऐसे अवसरपर किसी शिकारीने हिरण मारा वह उस श्रावकके चरणोंमें गिरकर मरगया ऐसे समयपर भी उस श्रावकने संसार दशा विचार सामायिकको नहीं छोडा ॥ ५३२ ॥ बावीसं तित्थयरा सामायियसंजमं उवदिसंति। छेदुवठावणियं पुण भयवं उसहो य वीरो य ॥५३३॥ . द्वाविंशतितीर्थकराः सामायिकसंयम उपदिशति। .
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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