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________________ १९४ मूलाचारपादेण किंचि गहणं करेण वा जं च भूमीए ॥४९९ ॥ एदे अण्णे बहुगा कारणभूदा अभोयणस्सेह । बीहणलोगदुगंछणसंजमणिव्वेदणटुं च ॥५००॥ काकोऽमेध्यं छर्दिः रोधनं रुधिरं चाश्रुपातश्च । जान्वधः आमर्शः जानूपरि व्यतिक्रमश्चैव ॥ ४९५ ॥ नाभ्यधोनिर्गमनं प्रत्याख्यातसेवना च जंतुवधः । काकादिपिंडहरणं पाणितः पिंडपतनं च ॥ ४९६ ॥ .. पाणौ जंतुवधः मांसादिदर्शनं च उपसर्गः । पादांतरे जीवसंपातो भाजनानां च ॥ ४९७ ॥ उच्चारः प्रस्रवणं अभोज्यगृहप्रवेशनं तथा पतनं । उपवेशनं सदंशः भूमिसंस्पर्शः निष्ठीवनं ॥ ४९८॥ उदरकृमिनिर्गमनं अदत्तग्रहणं प्रहारो ग्रामदाहश्च । पादेन किंचिद्ग्रहणं करेण वा यच्च भूमौ ॥ ४९९ ॥ एतेऽन्ये बहवः कारणभूता अभोजनस्येह । भयलोकजुगुप्सा संयमनिर्वेदनार्थ च ॥ ५०० ॥ अर्थ-साधुके चलते समय वा खड़े रहते समय ऊपर जो कौआ आदि वीट करें तो वह काक नामा भोजनका अंतराय है। अशुचि वस्तुसे चरण लिप्त होजाना वह अमेध्य अंतराय है। वमन होना छर्दि है। भोजनका निषेध करना रोध है। अपने या दूसरेके लोही निकलता देखना रुधिर है। दुःखसे आंसू निकलते देखना अश्रुपात है ६ रुदन होते गोड़के नीचे हाथसे स्पर्श करना जान्वधः परामर्श है ७ तथा गोड़के प्रमाण काठके ऊपर उलंघ जाना वह जानूपरि व्यतिक्रम अंतराय है ८ ॥नाभिसे
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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