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मूलाचार
रक्षाकेलिये, उत्तम क्षमादि धर्मके पालनेकेलिये भोजन करना चाहिये ॥ ४७९॥ आदंके उवसग्गे तिरक्खणे बंभचेरगुत्तीओ। पाणिदयातवहेऊ सरीरपरिहार वेच्छेदो ॥ ४८०॥
आतंके उपसर्गे तितिक्षायां ब्रह्मचर्यगुप्तेः।। प्राणिदयातपोहेतौ शरीरपरिहारे व्युच्छेदः ॥ ४८० ॥
अर्थ-व्याधिके अकस्मात् होजानेपर, देव मनुष्यादिकृत उपसर्ग होनेपर उत्तमक्षमा धारण करने के समय, ब्रह्मचर्यरक्षण करनेके निमित्त, प्राणियोंकी दया पालनेके निमित्त, अनशन तपके निमित्त, शरीरसे ममता छोड़ने के निमित्त-इन छह कारणों के होनेपर भोजनका त्याग करना योग्य है ॥ ४८० ॥ ण बलाउसाउअहँ ण सरीरस्सुवचय? तेजढें । णाण संजमढे झाणटुं चेव भुंजेजो ॥ ४८१ ॥
न बलायुःस्वादार्थ न शरीरस्योपचयार्थं तेजोर्थ । ज्ञानार्थ संयमार्थ ध्यानार्थ चैव भुंजीत ॥ ४८१ ॥
अर्थ-साधु बलके लिये, आयु बढानेके लिये, खादकेलिये, शरीरको पुष्ट होनेके लिये, शरीरके तेज बढने के लिये भोजन नहीं करते किंतु वे ज्ञान ( स्वाध्याय ) केलिये संयम पालनेके लिये ध्यान होनेके लिये भोजन करते हैं ॥ ४८१ ॥ णवकोडीपरिसुद्धं असणं बादालदोसपरिहीणं । संजोजणाय हीणं पमाणसहियं विहिसु दिण्णं॥४८२॥ विगदिंगाल विधूमं छक्कारणसंजुदं कमविसुद्धं । जत्तासाधणमत्तं चोद्दसमलवजिदं भुंजे ॥ ४८३ ॥