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________________ १८६ मूलाचारगेरुय हरिदालेण व सेडीय मणोसिलामपिटेण । सपबालोदणलेवे ण व देयं करभायणे लित्तं ॥४७४॥ गैरिकया हरितालेन वा सेटिकया मनःशिलया आमपिष्टेन । सप्रवालोदनलेपे न वा देयं करभाजने लिप्तम् ॥ ४७४ ॥ __अर्थ-गेरू, हरताल, खड़िया, मैनशिल, चावल आदिका चूर्ण कच्चा शाक-इनसे लिप्त हाथ तथा पात्र अथवा अप्रासुक जलसे भीगा हाथ तथा पात्र इन दोनोंसे भोजन दे तो लिप्त दोष होता है ॥ ४७४ ॥ बहु परिसाडणमुज्झिअ आहारो परिगलंत दिजंतं । छंडिय मुंजणमहवा छंडियदोसो हवे णेओ ॥४७॥ बहु परिसातनमुज्झित्वा आहारं परिगलंतं दीयमानं । त्यक्त्वा भुंजनमथवा त्यक्तदोषो भवेत् ज्ञेयः ॥ ४७५ ॥ अर्थ-बहुत भोजनको थोड़ा भोजन करे, छाछ आदिसे झरते हुए हाथसे भोजन करे अथवा किसी एक आहारको छोड़कर ग्रहण करे उसके त्यक्तदोष होता है ऐसा जानना ॥ ४७५ ।। संजोयणा य दोसो जो संजोएदि भत्तपाणं तु। अदिमत्तो आहारो पमाणदोसो हव दि एसो ॥४७६॥ संयोजनं च दोषः यः संयोजयति भक्तपानं तु । अतिमात्र आहारः प्रमाणदोषो भवति एषः ॥ ४७६ ॥ अर्थ-जो ठंडा भोजन गरम जलसे मिलाना अथवा ठंडा जल गरम भोजनसे मिलावे उसके संयोजना दोष होता है। और जो मात्राको उलंघकर भोजन करे तो उसके प्रमाणंदोष होता है ॥ ४७६ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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