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________________ पिण्डशुद्धि-अधिकार ६। शल्यचिकित्सा । इनका उपदेश देकर आहार लेना वहां चिकित्सादोष होता है ॥ ४५२ ॥ कोधेण य माणेण य मायालोभेण चावि उप्पादो। उप्पादणा य दोसो चदुविहो होदि णाययो ॥४५३॥ क्रोधेन च मानेन च मायालोमेन चापि उत्पादः। उत्पादनश्च दोषः चतुर्विधो भवति ज्ञातव्यः ॥ ४५३ ॥ अर्थ-क्रोधसे भिक्षा लेना मानसे आहार लेना मायासे आहार लेना लोभसे आहार लेना-इसप्रकार क्रोध मान माया लोभरूप उत्पादनदोष होता है ऐसा जानना ॥ ४५३ ॥ कोधो य हथिकप्पे माणो वेणायडम्मि णयरम्मि। माया वाणारसिए लोभो रासीयणयरम्मि ॥ ४५४ ॥ क्रोधश्च हस्तिकल्पे मानो वेणातटे नगरे । माया वाराणस्यां लोभो रासीयनगरे ॥ ४५४ ॥ अर्थ-किसी साधुने हस्तिकल्पनगरमें क्रोध करके भिक्षा ग्रहण की, किसीने वेणातट नगरमें मान करके आहार लिया, किसी साधुने मायाचारीसे बनारसमें आहार लिया और किसीने लोभसे राशियाननगरमें भिक्षा ली ॥ ४५४ ॥ दायगपुरदो कित्ती तं दाणवदी जसोधरो वेति । पुव्वीसंथुदि दोसो विस्सरिदे बोधणं चावि ॥ ४५५॥ दायकपुरतः कीर्तिस्त्वं दानपतिः यशोधरो वा इति । पूर्वसंस्तुतिदोषो विस्मृते बोधनं चापि ॥ ४५५॥ अर्थ-दान देनेवालेके आगे यदि साधु उसकी प्रशंसा करे कि तुम दानपति हो यशोधर हो तुमारी कीर्ति लोकमें प्रसिद्ध है
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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