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________________ पिण्डशुद्धि-अधिकार ६। १६९ औद्देशिक है । अथवा संक्षेपसे समौदेशिकके कहे जानेवाले चार भेद हैं ॥ ४२५ ॥ जावदियं उद्देसो पासंडोत्ति य हवे समुद्देसो। समणोत्ति य आदेसो णिग्गंथोत्ति य हवे समादेसो॥ यावान् उद्देशः पाषंड इति च भवेत् समुद्देशः । श्रमण इति च आदेशो निग्रंथ इति च भवेत् समादेशः॥ अर्थ-जो कोई आयेगा सबको देंगे ऐसे उद्देशसे किया अन्न यावानुद्देश १ है, पाखंडी अन्यलिंगीके निमित्तसे बना हुआ अन्न समुद्देश है २, तापस परिव्राजक आदिके बनाया भोजन आदेश है ३, निग्रंथ (दिगंबर ) साधुओंके निमित्त बनाया गया समादेश दोष सहित है ४ ॥ ये चार औद्देशिकके भेद हैं ॥४२६ आगे अध्यधिदोषका स्वरूप कहते हैं;जलतंदुलपक्खेवो दाणटुं संजदाण सयपयणे। अज्झोवोज्झं णेयं अहवा पागं तु जाव रोहो वा ॥ जलतंदुलप्रक्षेपो दानार्थ संयतानां स्वपचने। अध्यधि ज्ञेयं अथवा पाकं तु यावत् रोधो वा ॥४२७ ॥ अर्थ-संयमी साधुको आता देख उनको देनेके लिये अपने निमित्त भातकेलिये चूल्हेपर रखे हुए जल और चांवलोंमें जल और चांवल मिलाकर फिर पकावे अथवा जब तक भोजन तयार न हो तबतक धर्म प्रश्नके बहानेसे उस साधुको रोक रखे वह अध्यधिदोष है ॥ ४२७ ॥ .. . अप्पासुएण मिस्सं पासुयदव्वं तु पूदिकम्मं तं । चुल्ली उक्खलि दव्वी भायणगंधत्ति पंचविहं ॥४२८॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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