SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 195
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १५८ मूलाचाररुदं कसायसहिदं झाणं भणियं समासेण ॥ ३९६ ॥ .. स्तन्यमृषासारक्षणेषु तथा चैव षड्विधारंभे । रौद्रं कषायसहितं ध्यानं भणितं समासेन ॥ ३९६ ॥ अर्थ-दूसरेके द्रव्य लेनेका अभिप्राय, झूठ बोलनेमें आनंद मानना, दूसरेके मारनेका अभिप्राय, छहकायके जीवोंकी विराधना अथवा असिमसि आदि परिग्रहके आरंभ व संग्रह करनेमें आनंद मानना-इनमें जो कषाय सहित मनको करना वह संक्षेपसे रौद्रध्यान कहागया है ॥ ३९६ ॥ अपहट्ट अट्टरुद्दे महाभए सुग्गदीयपञ्चूहे । धम्मे वा सुक्के वा होहि समण्णागदमदीओ ॥ ३९७ ॥ अपहृत्य आरौिद्रे महाभये सुगतिप्रत्यूहे । धर्मे वा शुक्ले वा भव समन्वागतमतिः ॥ ३९७ ॥ अर्थ—आर्तध्यान रौद्रध्यान ये दो ध्यान संसारके भयके देनेवाले हैं, देवगति मोक्षगतिके रोकनेवाले हैं इसलिये इन दोनोंका त्याग करके हे भव्य तू धर्मध्यान शुक्लध्यान इन दो ध्यानोंमें आदर बुद्धि कर ॥ ३९७ ॥ एयग्गेण मणं णिरंभिऊण धम्मं चउव्विहं झाहि । आणापायविवायविजओ संठाणविचयं च ॥ ३९८ ॥ एकाग्रेण मनो निरुध्य धर्म चतुर्विधं ध्याय । आज्ञापायविपाकविचयः संस्थानविचयश्च ॥ ३९८ ॥ अर्थ-एकाग्रतासे इन्द्रियोंका व्यापार तथा मनका व्यापार रोककर अर्थात् अपने वशमें कर हे भव्य तू चारप्रकारके धर्म
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy