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________________ पंचाचाराधिकार ५। १४७ पंचविहो खलु विणओ पंचमगइणायगो भणिओ३६४ दर्शनज्ञाने विनयः चारित्रतप औपचारिकः विनयः । पंचविधः खलु विनयः पंचमगतिनायको भणितः॥३६४॥ अर्थ-दर्शनविनय, ज्ञानविनय, तपोविनय, चारित्रविनय उपचारविनय-इसतरह विनयके पांच भेद हैं । यह विनय मोक्ष ( सिद्ध )गतिको प्राप्त करानेवाला कहा गया है ॥ ३६४ ॥ उवगृहणादिआ पुव्वुत्ता तह भत्तिआदिआ य गुणा । संकादिवजणं पिय दंसणविणओ समासेण ॥ ३६५॥ उपगृहनादिकाः पूर्वोक्ता तथा भक्त्यादयश्च गुणाः। शंकादिवर्जनमपि च दर्शनविनयः समासेन ॥ ३६५ ॥ अर्थ-उपगूहन आदि पहले कहे हुए गुण, पंचपरमेष्ठीकी भक्ति आदि, और शंकादि दोषोंका त्याग होना वह संक्षेपसे दर्शनविनय कहा गया है ॥ ३६५ ॥ जे अत्थपन्जया खलु उवदिट्ठा जिणवरेहिं सुदणाणे । ते तह रोचेदि णरो दंसणविणओ हवदि एसो ३६६ ये अर्थपर्यायाः खलु उपदिष्टा जिनवरैः श्रुतज्ञाने । तान् तथा रोचयति नरः दर्शनविनयः भवति एषः ३६६ अर्थ-जो जिनवरदेवने द्वादशांग श्रुत ज्ञानमें स्थूल सूक्ष्म जीव अजीवादिद्रव्योंके पर्याय कहे हैं उसी प्रकार प्रतीति करना वह भव्यजीवके दर्शनविनय होता है ॥ ३६६ ।। काले विणए उवहाणे बहुमाणे तहेव णिण्हवणे । वंजणअत्थतदुभयं विणओ णाणम्हि अहविहो ३६७ काले विनये उपधाने बहुमाने तथैव अनिद्भवे ।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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