SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 182
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ पंचाचाराधिकार ५। जो आगममें प्रवेश करनेवाले ज्ञानी जनोंकर जाना गया ऐसा अंतरंगतप है उसे भी मैं कहता हूं ॥ ३५९ ॥ ___ अब अंतरंगतपके भेदोंको कहते हैंपायच्छित्तं विणयं वेजावचं तहेव सज्झायं । झाणं च विउस्सग्गो अब्भंतरओ तवो एसो ॥३६॥ प्रायश्चित्तं विनयो वैयावृत्त्यं तथैव स्वाध्यायः। ध्यानं च व्युत्सर्गः अभ्यंतरं तपः एतत् ॥ ३६० ॥ अर्थ-प्रायश्चित्त विनय वैयावृत्त्य खाध्याय ध्यान व्युत्सर्ग-ये छह भेद अंतरंग तपके हैं ॥ ३६० ॥ आगे प्रायश्चित्ततपका खरूप कहते हैं;पायच्छित्तं ति तवो जेण विसुज्झदि हुपुव्वकयपावं । पायच्छित्तं पत्तोत्ति तेण वुत्तं दसविधं तु ॥ ३६१॥ प्रायश्चित्तं इति तपो येन विशुध्यति हि पूर्वकृतपापात् । प्रायश्चित्तं प्राप्त इति तेन उक्तं दशविधं तु ॥ ३६१ ॥ अर्थ-व्रतमें लगेहुए दोषोंको प्राप्त हुआ यति जिससे पूर्व किये पापोंसे निर्दोष होजाय वह प्रायश्चित्ततप है उसके दस भेद हैं ॥ ३६१॥ आलोयण पडिकमणं उभय विवेगो तहा विउस्सग्गो। तव छेदो मूलं विय परिहारो चेव सद्दहणा ॥ ३६२॥ आलोचना प्रतिक्रमणं उभयं विवेकं तथा व्युत्सर्गः । तपः छेदो मूलमपि च परिहारः चैव श्रद्धानं ॥ ३६२ ॥ अर्थ-आलोचना, प्रतिक्रमण, दोनों, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, मूल, परिहार, श्रद्धान-ये दश भेद प्रायश्चित्तके हैं । १० मूला.
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy