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मूलाचारआगे जलकायके जीवोंका वर्णन करते हैं;ओसाय हिमग महिगा हरदणु सुद्धोदगे घणुदगे य। ते जाण आउजीवा जाणित्ता परिहरेदव्वा ॥ २१०॥
अवश्यायं हिमं महिकां हरत् अणुं शुद्धोदकं घनोदकं च । तान् जानीहि अप्जीवान् ज्ञात्वा परिहतेव्याः ॥ २१० ॥
अर्थ-ओस, बर्फ, धुआंके समान पाला, स्थूलबिंदु रूप जल, सूक्ष्मबिंदुरूप जल, चंद्रकांत मणिसे उत्पन्न शुद्धजल, झरनासे उत्पन्न जल, मेघका जल वा घनोदधिवातजल-ये सब जलकायिक जीव हैं । इनको जानकर इनकी हिंसाका त्याग करना चाहिये ॥२१० ॥ __ आगे अमिकायिक जीवोंके भेद कहते हैं;- . इंगाल जाल अच्ची मुम्मुर सुद्धागणीय अगणी य । ते जाण तेउजीवा जाणित्ता परिहरेदव्वा ॥ २११॥
अंगारं ज्वाला अर्चिमुर्मुरं शुद्धाग्निः अग्निश्च । तान् जानीहि तेजोजीवान् ज्ञात्वा परिहर्तव्याः ॥२११॥
अर्थ-धुआंरहित अंगार, ज्वाला, दीपककी लौ, कंडाकी आग और वज्रामि विजली आदिसे उत्पन्न शुद्ध अमि, सामान्य अग्नि-ये तेजकायिक जीव हैं इनको जानकर इनकी हिंसाका त्याग करना चाहिये ॥ २११ ॥ ___ आगे वायुकायिक जीवोंके भेद कहते हैंवादुन्भामो उक्कलि मंडलि गुंजा महा घणु तणू य । ते जाण वाउजीवा जाणित्ता परिहरेदव्वा ॥ २१२ ॥
वातोदामो उत्कलिः मंडलिः गुंजा महान् घनस्तनुश्च ।