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________________ समाचाराधिकार ४ । हास्यादिमिश्रित वार्तालाप करे तो उसने आज्ञाकोप आदि पांचौ ही दोष ( पाप ) किये ऐसा जानना ॥ १७९ ॥ णो कप्पदि विरदाणं विरदीणमुवासयमि चिट्ठदुं । तत्थ णिसेजउवट्टणसज्झाहारभिक्खवोसरणे ॥१८॥ न कल्पते विरतानां विरतीनामुपाश्रये स्थातुम् । तत्र निषधोद्वर्तनस्वाध्यायाहारभिक्षाव्युत्सर्जनानि ॥१८०॥ अर्थ-संयमी मुनियोंको आर्थिकाओंकी वसतिकामें ठहरना योग्य नहीं है । और वहां वैठना, सोना, स्वाध्यायकरना, आहार व भिक्षा ग्रहण करना तथा प्रतिक्रमणादि व मलका त्याग इत्यादि क्रियायें भी नहीं करनी चाहिये ॥ १८० ॥ आर्याओंकर बनाया भोजन आहार व श्राविकाओंकर बनाया हुआ भोजन भिक्षा भोजन कहलाता है। __ आगे कहते हैं कि स्थविरपन आदि गुणवाला भी स्त्रीसंगतिसे विगड़ जाता है;थेरं चिरपव्वइयं आयरियं बहुसुदं च तवसिं वा । ण गणेदि काममलिणो कुलमपि सवणो विणासेइ१८१ स्थविरं चिरप्रवजितं आचार्य बहुश्रुतं च तपस्विनं वा । न गणयति काममलिनः कुलमपि श्रमणः विनाशयति॥१८१ अर्थ-कामवासनासे मैले चित्तवाला मुनि आत्माके महत्त्वको, बहुतकालकी दीक्षाको, अपनी आचार्यपदवीको, उपाध्याय (सब शास्त्रोंका जानकर ) पनेको, बेला तेला आदि तपसे हुए तापसीपनको, तथा अपनी कुलपरंपराको नहीं गिनता है सबको नष्ट कर देता है और अपने सम्यक्त्वादि गुणों का भी नाश करता है ॥ १८१ ६ मूला.
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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