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________________ समाचाराधिकार ४ । ६९ आगे ऐसा एकाकी विहार करे तो इतने दोष होते हैं ऐसा कहते हैंगुरुपरिवादो सुदवोछेदो तित्थस्स मइलणा जडदा । भेभलकुसीलपासत्थदा य उस्सारकप्पम्हि ॥ १५१ ॥ गुरुपरिवादः श्रुतव्युच्छेदः तीर्थस्य मलिनत्वं जडता। विह्वलकुशीलपार्श्वस्थता च उत्सारकल्पे ॥ १५१ ॥ अर्थ-गणको छोड़ अकेले विहार करनेमें इतने दोष होते हैं-दीक्षादेनेवाले गुरूकी निंदा, श्रुतका विनाश, जिनशासनमें कलंक लगाना कि सब साधु ऐसे ही होंगे, मूर्खता, विह्वलता, कुशीलपना, पार्श्वस्थता, ये भ्रष्ट मुनियोंके भेद हैं इनको कहेंगे ॥ १५१ ॥ आगे कहते हैं कि ये दोष तो होते ही हैं परंतु अपनेको मी विपत्ति होती है;कंटयखण्णुयपडिणियसाणागेणादिसप्पमेच्छेहिं । पावइ आदविवत्ती विसेण व विसूइया चेव ॥१५२॥ कंटकस्थाणुप्रत्यनीकश्वगवादिसर्पम्लेच्छैः। प्राप्नोति आत्मविपत्तिं विषेण वा विसूचिकया चैव॥१५२॥ अर्थ-जो स्वच्छंद विहार करता है वह कांटे, स्थाणु (डूंठ ), क्रोधसे आये हुए कुत्ते बैल आदिकर तथा सर्प, म्लेच्छ, विष, अजीर्ण-इनकर अपने मरणको व दुःखको पाता है ॥१५२॥ वह दूसरेको भी नहीं चाहता ऐसा कहते हैं;गारविओ गिद्धीओ माइल्लो अलसलुद्धणिद्धम्मो । गच्छेवि संवसंतो णेच्छइ संघाडयं मंदो ॥१५३ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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