SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 101
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मूलाचार उपसंपत् च ज्ञेया पंचविधा जिनवरैः निर्दिष्टा । विनये क्षेत्रे मार्गे सुखदुःखे चैव सूत्रे च ॥ १३९ ॥ अर्थ-गुरुजनोंके लिये मैं आपका हूं ऐसा आत्मसमर्पण वह उपसंपत् है । उसको पांचप्रकार विनयमें, क्षेत्रमें, मार्गमें, सुख दुःखमें, और सूत्रमें करना चाहिये ॥ १३९ ॥ आगे प्रथम विनयमें उपसंपत्को कहते हैंपाहुणविणउवचारो तेसिं चावास भूमिसंपुच्छा। दाणाणुवत्तणादी विणये उवसंपया णेया ॥ १४०॥ प्राघूर्णिकविनयोपचारौ तेषां चावासभूमिसंपृच्छा। दानानुवर्तनादयः विनये उपसंपत् ज्ञेया ॥ १४० ॥ अर्थ-अन्यसंघके आये हुए मुनियोंका अंगमर्दन प्रियवचनरूप विनय करना, आसनादिपर बैठाना इत्यादि उपचार करना, गुरुके विराजनेका स्थान पूछना, आगमनका रास्ता पूछना, संस्तर पुस्तक आदि उपकरणोंका देना और उनके अनुकूल आचरणादिक करना वह विनयोपसंपत् है ॥ १४० ॥ __ आगे क्षेत्रोपसंपत्को कहते हैं;संजमतवगुणसीला जमणियमादी य जमि खेत्तमि। वटुंति तमि वासो खेत्ते उवसंपया णेया ॥ १४१ ॥ संयमतपोगुणशीला यमनियमादयश्च यस्मिन् क्षेत्रे । वर्धते तस्मिन् वासः क्षेत्रे उपसंपत् ज्ञेया ॥ १४१॥ अर्थ-संयम तप उपशमादि गुण व व्रतरक्षारूप शील तथा जीवनपर्यंत त्यागरूप यम, कालके नियमसे त्याग करनेरूप नियम
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy