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________________ व्याख्यान ४९ : : ४३९ : दूसरे हँसो से कहा कि - " हे पुत्र पौत्रो ! इस लता के अंकुर को तुम सब चौचद्वारा काट डालो कि जिससे सब की मृत्यु न हों। " यह सुन कर उन युवान हंसोंने हँसते हुए कहा कि - " अहो ! यह वृद्ध मृत्यु से कितना डरता हैं ? हमेशा जीने की अभिलाषा रखता है । इस अंकुर से हमारा क्या अहित हो सकता है ?" यह जान कर वृद्ध हंसने विचार किया कि- अहो ! ये युवान कैसे मूर्ख हैं कि जो अपने हित अहित की बात भी नहीं जान सकते हैं । कहा भी हैं किप्रायः संप्रति कोपाय, सन्मार्गस्योपदर्शनम् । निलूननासिकस्येव, विशुद्धादर्शदर्शनात् ॥ १ ॥ भावार्थ:-- आजकल सत्य मार्ग का उपदेश करना बहुधा क्रोध का माजन मात्र है । जैसे नाक कटे पुरुष को निर्मल अरिसा दिखाना केवल उससे झगड़ा मोल लेना है । अपितु - उपदेशो न दातव्यो, यादृशे तादृशे नरे । पश्य वानरमूर्खेण, सुगृही निर्गृही कृता ॥ १॥ भावार्थ:- जिस किसी को उपदेश देना व्यर्थ है क्योंकि देखिये इस प्रकार का विना विचार किये उपदेश देने में मूर्ख वानर से सुगृही को घर रहित कर दिया । एक वृक्ष पर एक सुगृही घर बना उस में सुख से
SR No.022318
Book TitleUpdesh Prasad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaylakshmisuri, Sumitrasinh Lodha
PublisherVijaynitisuri Jain Library
Publication Year1947
Total Pages606
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size34 MB
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