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________________ : २०४:. श्री उपदेशप्रासाद भाषान्तर : तत्पश्चात् राजाने धनपाल पंडित से कहा कि-तू मेरी मृगया का वर्णन कर । इस पर धनपाल बोला कि रसातलं यातु यदत्र पौरुषं, कुनीतिरेषाऽशरणो ह्यदोषवान् । निहन्यते यद्बलिनातिदुर्बलो, हा हा महाकष्टमराजकं जगत् ॥ १॥ भावार्थ:-यह वराह ऐसा कहता है कि-हे राजा! तेरा पुरुषार्थ रसातल में जावे। यह प्रत्यक्ष अनीति है, क्यों कि शरण रहित और निर्दोष दुर्बल प्राणियों की बलवान द्वारा हत्या होती है । अहो महादुःख की बात हैं कि यह जगत् राजा रहित है। पदे पदे सन्ति भटा रणोत्कटा, न तेषु हिंसारस एष पूर्यते। धिगीदृशं ते नृपते ! कुविक्रम, कृपाश्रये यः कृपणे मृगे माये ॥२॥ भावार्थ:-और यह मृग कहता हैं कि-हे राजा! संग्रामशूरवीर योद्धा इस दुनिया में कई स्थान पर हैं परन्तु फिर भी एसा उनके विषय में तेरा हिंसारस पूरा नहीं
SR No.022318
Book TitleUpdesh Prasad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaylakshmisuri, Sumitrasinh Lodha
PublisherVijaynitisuri Jain Library
Publication Year1947
Total Pages606
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size34 MB
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