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________________ उपमितिमव प्र० कथा ] 137 [ अध्याय-३सोलसकसायनवनोकसायरहियं विसुद्धलेसागं । ससहावठिअं अप्पाणमेव जाणेह चारित्तं ॥९॥ इच्छानिरोहओ सुद्धसंवरो परिणओ अ समयाए । कम्माइं निजरंतो तवोमओ चेव एसप्पा ॥१०॥ एवं च ठिए अप्पाणमेव नवपयमयं विआणित्ता। अप्पमि चेव निच्चं लीणमणा होह भो भविया ॥ ११ ॥ *श्री परमात्म-स्तवनम् नमस्ते जगदानन्द !, मोक्षमार्गविधायक ! । जिनेन्द्र विदिताशेषभाव ! सद्भावनायक ! ॥१॥ प्रलीनाशेषसंसारविस्तार ! परमेश्वर !। नमस्ते वापथातीत :, त्रिलोकनरशेखर ! ॥२॥ भवाब्धिपतितानन्तसत्त्वसन्तानतारक !। घोरसंसारकान्तारसार्थवाह ! नमोऽस्तु ते अनन्तपरमानन्दपूर्णधामव्यवस्थितम् । भवन्तं भक्तितः साक्षात्पश्यतीह जनो जिन! ॥४॥ * श्री सुबुद्धिमन्त्रिणा संदब्धम्
SR No.022310
Book TitleSwadhyay Dohanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakvijay Muni
PublisherVijaydansuri Granthmala
Publication Year1940
Total Pages254
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Book_Gujarati
File Size14 MB
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