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मूलशुद्धिप्रकरणम्-द्वितीयो भागः
इय जा खणंतरेक्कं चिट्ठइ सा दुक्खिया तहिं बाला । ता उग्गमेइ राया राय व्व तमारिखयकारी ॥११४॥ तं दट्ठूणूससिया मण्णइ उज्जीवियं व अप्पाणं । अहवा पीऊसरुई आसासइ जं किमच्छेरं ॥ ११५ ॥ तो बहुविहचिंतावाउलाइ अइदुक्खियाए सा रयणी । चउजामनिम्मिया विहु जामसहस्सं व वोलीणा ॥ ११६ ॥ अह उग्गयम्मि सूरे सा नम्मयसुंदरी दुगुणदुक्खा । विडं पत्ता, सुमरिय नियनाहगुणनियरं ॥११७॥ अवि य
हा ! पडिवण्णय वच्छल ! दक्खिन्नयनीरपूरसरिनाह ! | हा ! करुणायर ! अहयं, कह मुक्का एक्किया रणे ॥११८॥ एवं विलवंती सा पुणो वि गच्छइ सरोवरंतेण । पुणरवि हिंड्इ रण्णे पुच्छंती हरिणमाईए ॥११९॥
किं दिट्ठो मह भत्ता कत्थइ तुब्भेहिं एत्थ भमडतो ?' । पडिसद्दं सोऊणं पविसइ गिरिकुहरमज्झम्मि ॥ १२० ॥ तत्थ वि तमपेच्छंती पुणो वि निग्गच्छई तओ एवं । वोलीणा पंच दिणा आहारविवज्जियाइ दढं ॥ १२१ ॥ अह छट्ठम्मि दिणम्मी भमडंती जाइ उयहितीरम्मि । जत्थाऽऽसि पवहणाइं चितइ तं सुण्णयं दट्टु ॥१२२॥ "रे रे ! जीव ! अलक्खण ? मुहाएं किं खिज्जसे तुमं एवं । जं अन्नभवोवत्तं तं को हु पणासिउं सत्तो ? ॥ १२३ ॥
रे जीव ! तया मुणिणा आइट्टं जं तयं इमं मण्णे । ता सम्मभावणाए सहसु तयं किं वरुण्णेणं ?" ॥ १२४ ॥ इय चिंतिऊण तो सागंतूण सरोवरम्मि नियदेहं । पखालिय संठाविय ठवणं तो वंदई देवे ॥ १२५ ॥ काऊण पाणवित्ति फलेहिं तो गिरिगुहाय मज्झम्मि । मट्टियमयजिणपडिमं काउं वंदेइ भत्तीए ॥ १२६ ॥ १. ला. हरिणिमा ॥
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