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+ सिद्धान्तसार
एवां अपेक्षाय वचन तो सूत्रमा गमगाम जे. जेम सकें भने चमरेंज कोषिक राजानी पके श्राव्या, अने अढार देशना राजा चेमा राजानी पके श्राव्या, त्यां धर्म स्हाज दीधी (दलश्ता) कयुं . ए पण भर्नु तथा राजानु केहेतुं सूत्रमा गुंथ्यु , ने ए पण अपेक्षाय वचन . वली जगवती सूत्र शतक पहेले, श्री पार्श्वनाथजीना संतानिया कालासवेसी. पुत्र-श्रणगारे श्री महावीर जगवंतना स्थिवरने कयुं के, तमे सामायक न जाणो, तथा सामायकनो अर्थ पण न जाणो, इत्यादिक आठ प्रश्न पुरया. पती श्री महावीरजीना स्थिवरे अर्थ बताव्या, त्यार पडी कालासवेसी-पुत्रे प्रतिबोध पामीने कयुं के, ए वचन में पूर्वे जाण्यां नही, सइयां नहिं, प्रतित्यां नहि, रुचव्यां नहिं, इत्यादिक घणा बोल कह्या. पड़ी कह्यु के, हवे में जाण्यां, सांजल्यां, सरदह्यां, प्र. तित्यां, रुचव्यां, एम कडं. हवे जुले ! सामायकादिक आठ बोल जाएया विना तथा सरदह्या प्रतित्या तथा रुचव्या विना श्री पार्श्वनाथजीना संतानीया केम कहेवाय ? परंतु ए अपेक्षाय वचन जे. श्रा स्थिवरोने एवं जाणपणुं , एवं पूर्व को पासे सांजव्यु,जाएयु, सरदह्यु, प्रतित्यु के रोचव्युं नहोतुं; पण ज्यारे स्थिवरे अर्थ कह्यो त्यारे जाएयु के, प्रा स्थिवरोने एवं जाणपणुं बे. हवे जाएयु, सरदयुं, प्रतित्युं श्रने रुच. व्यु, ए स्थिवरनी अपेक्षाये जेवां कालासवेसीए कह्यां तेवां अपेक्षाय वचन गणधरे सूत्रमा गुथ्यां. तेम बाईकुमारे पण ज्यारे ब्राह्मणोए गुरुपणुंजणाव्यु, अने ब्राह्मणोने जमाड्यामां पुन्यनो खंध तथा मोक्षतुं अंग बे एम जणाव्यु, त्यारे बाईकुमारे तेनी कहेणीनी अपेक्षाए तेनो उतर दीधो के, जो एवं सरदहे तो नारकीमांजाय. ए पण गुरुनी बुझे मोकने अर्थे दान देवा पाश्री ना कही , पण अहोयां अनुकंपादाननो प्रश्न नथी. ___ चली तेरापंथी कहे के “ उत्तराध्ययन सूत्रना बौदमा अध्ययः ननी बारमो गाथाथां जगुपुरोहीतने पोताना बेटाए कह्यु के, ब्राह्मणने जमाने तो तमतमाए (सातमी नारकीमा) पहोंचे, एम कडं जे.ए न्याये असे गरीब मागता नीखारी तथा ब्राह्मण प्रमुख सर्व असजतिने अनुः