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________________ (६५) श्री महानिशीथ सूत्रमा पण ते कुमतियो अन्यथा वचननी शंका करे, ते कहे. ज्रष्टैश्चैत्यकृतेऽर्थितः कुवलयाचार्यो जिनेखालये, यद्यप्यस्ति तथाप्यदःस तमश्त्युक्त्वा नवं तीर्णवान्। एतत्किं नवनीतसार वचनं नो मानमायुष्मतां, यत्कुर्वति महानिशीथवलतोऽव्यस्तवस्थापनं ॥४३॥ अर्थ-ज्रष्ट कुमतियोए चैत्यालय करवाविषे श्री कुवलयप्रन आचार्यनी प्रार्थना करी, त्यारे ते आचार्ये कह्यु के, चैत्यालय विषे कहेवानुं वे पण ते पापसहित बे; आq वचन कही ते आचार्य संसारसमज तरी गया हता. आ प्रमाणे नवनीतसार अध्ययनवचन श्रेष्ठ आयुष्यवाला एवा तमने शुं प्रमाण नथी? के जेथी तेश्रो महानिशीथ सूत्रना बलथी व्यस्तवनुं स्थापन कहे . ४३ विशेषार्थ-ज्यां मात्र एक वचनथी पण अव्यस्तवनी प्रशंसा करवानो निषेध होय त्यां चैत्य, करवं के करावq विगेरे केम विहित थशे. ४३. ___ हवे तेनो उत्तर आपेले. ज्रांतप्रांतधिया किमेतदितं पूर्वापरानिश्चयात्, येन स्वश्रुम कृप्तचैत्यममता मूढात्मनां लिंगिनां । उन्मार्गस्थिरता न्यषेधि न पुनश्चैत्य स्थितिः सूरिणा, वाग्नंगी किमु यद्यपीतिन मुखं वकं विधत्ते तव ॥४॥ अर्थ-हे ब्रांत ! ग्रंथना पूर्वापर तात्पर्यनो विचार कर्याविना
SR No.022204
Book TitlePratima Shatak
Original Sutra AuthorYashovijay Maharaj
AuthorBhavprabhsuri, Mulchand Nathubhai Vakil
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1903
Total Pages158
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari & Book_Gujarati
File Size10 MB
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