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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra उत्तराध्ययनसूत्रम् ।।७९५|| www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir [सम्मपनीओ] कर्म संघाते है एवो तथा [असो] पराधीन एवो [सम्ब] सर्व [दुपय च] द्विपदने तथा [चउप्पय' [च] चतुष्पदने तथा [खित '] क्षेत्र [ग] घरने [धण] धनने [धन्न च] शाळी विगेरे धान्यने [चिवा] तजीने [सुंदर ] सारा [वा] अथवा [पावग' ] अशुभ एवt [पर भव] परभव प्रत्ये [पयाइ] जाय हे २४ व्या० - अशरण भावनामुक्त्वा एकत्वभावनां वदति - अयं स्वकर्मात्मद्वितीयो जीवः, स्वस्य कर्म स्वकर्म, | स्वकर्म एवात्मनो द्वितीयं यस्य स स्वकर्मात्मद्वितीयः, स्वकर्मसहितोऽयं जीवः सुंदरं देवलोकादिस्थानं वाऽथवा पापकं नरकादिस्थानं, एवंविधं परं भवमन्यलोकं अवशः सन् प्रयाति किं कृत्वा ? द्विपदं भार्यादि च पुनश्चतुःपदं गजाश्वादि, क्षेत्रं ईक्षुक्षेत्रादि, गृहं सप्तभौमिकादि, धनं दीनारादिरजतस्वर्णादि, धान्यं तंडुलगोधूमादि, नशब्दाद्वस्त्राभर णसाररत्नादि, एतत्सर्वं त्यक्त्वा हित्वा जीवः परभवे व्रजतीत्यर्थः ॥ २४ ॥ अथ मरणानंतरं पश्चात्तस्य पुत्रकलत्रादयः किं कुर्वतीत्याह अशरण भावना कहीने हवे एकत्वभावना कहे छे-आ, पोताना कर्म रूप जेने बीजो सहाय छे एवो जीव=पोतानुं कर्म एन | जेने द्वितीय छे एवो जीव; सुंदर-देवलोकादि स्थान अथवा पापक नरकादि स्थान, एवा प्रकारना परभव-अन्यलोकने अवश बनीने पामे छे. केम करीने? द्विपद-भार्यादिक मनुष्योने तथा चतुष्पद हाथी घोडा वगेरेने, क्षेत्र - शेरडीना खेतरो, गृह-सात सात माळनी महेलातो, धन- सोनारूपाना नाणां, धान्य-घडं चोखा वगेरे; 'च' शब्दयी वस्त्र आभरण रत्न इत्यादि सर्वने खजीने जीव परभवे जाय छे. २४ हवे मरणने अनंतर तेना स्त्रीपुत्रादिक शुं करे छे ? ते कहे छे For Private and Personal Use Only भाषांतर अध्य०१३ ।।७९५ ।।
SR No.020856
Book TitleUttaradhyayan Sutram Part 03
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorLakshmivallabh Gani
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1936
Total Pages291
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size17 MB
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