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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatrth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ॥७५०॥ UE] थइ हणवा आव्या; आ प्रसंगे कुमारे एवी तो पोतानी प्रहार करवानी शक्ति देखाडी के ए बधाय चोर लडपैयाओ कुमारना महा-1101 उत्तराध्यरथी जाजरा बनी चारेकोर दिशाओमां जीव लइ भागी नीकळ्या. त्यार पछी रथ उपर चढो कुमार चालता थया. वरधनुए कुमा भाषांतर पनसूत्रम् अध्य०१३ रने कयु तमे बहु श्रम लीधो तेथी थाक्या हशो माटे मुहूर्त मात्र ( वे घडीज ) आ रथमां जरा निद्रामुख अनुभवो-एटले कुमार || ॥७५०11 रत्नवतीनी साथे रथमा मूता. मार्गमा एक पर्वतना वचमां नदी आवो त्यां मूधीपां तो घोडा थाकीने लोथ जेवा थइ गया हता अने आगळ जराय चालता नहोता ते वारे कंइ कारणथी कुमार जागी उठ्या, जुए छे तो घोडा छेक थाकी गयेला छे अने रथनी आगळ वरधनुने न जोया तेथी 'वखते जळ लेवा गयेल हशे.' एम धार्यु. आम तेम नजर फेरवतां कुमारे रथनो आगलो भाग रुधिरथी खरडायेलो जोयो ते उपरथी 'वरधनु मराणो' एम जाणी 'हायरे मारो सुहृद् हणाणो' आम शोक पीडित थइ बोलता कुमार रथमाथी मूर्छा खाइने पडी गया. पुनरपि लब्धचैतन्यः स एवं विललाप, हा भ्रातः! हा वरधनुमित्र! त्वं क गतोऽसीति बिलपन कुमारः कथमपि | रत्नवत्या रक्षितः. कुमारो रत्नवतींप्रत्येवमाह सुंदरि! न ज्ञायते वरधनुर्मृतो जीवन् वास्तीति. ततोऽहं तदन्वेषणार्थ पश्चाद् व्रजामि. तया भणितमार्यपुत्र ! अवसरो नास्ति पश्चाद्वलनस्य, येनाहमेकाकिनी, चौरश्वापदादिभोमं चारण्यमिदं, अत्र च निकटवर्ती सीमावकाशोऽस्ति, येन परिम्लानाः कुशकंटका दृश्यंते. एतद्रत्नवतीवचः प्रतिपद्य रत्नवत्या सह कुमारः पथि गंतु प्रवृत्तः. मगधदेशसंधिसंस्थितमेकं ग्रामं च प्राप्तः, तत्र प्रविशन् कुमारः सभामध्यस्थितेन ग्रामा|धिपतिना दृष्ट.. दर्शनानंतरमेव एष न सामान्यः पुरुष इति ज्ञात्वा सोपचार प्रतिपच्या पूजितो नीतश्च स्वग्रहं. दस PaperDroजाक Fer Private and Personal Use Only
SR No.020856
Book TitleUttaradhyayan Sutram Part 03
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorLakshmivallabh Gani
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1936
Total Pages291
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size17 MB
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