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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir १६३ मघा - नक्षत्र १-१६ मति-अज्ञान - ज्ञानभेद ९-५ मतिज्ञान ( मदि-) - ज्ञानभेद ९-५,१२-२९ आदि मद्य ( मज ) - दूसरा व्यसन ३-१० मधुकैटभ (-कीटभ ) - ४ थे प्रतिनारायण १-५४ मभ्यलोक ( मज्झिम लोय ) - आकार १-५; ऊँचाई १-७ मद्य ( मण ) - योगविशेष ३-२७ मनुष्य गति ( माणुस-) - १२-३ मनः पर्यय ( मणपज्जय)- ज्ञानभेद ९-५; १२-३४ मनःपर्यय आवरण ( मणणाणा- ) - ज्ञानावरण कर्म का भेद १०-४ मनुष्यायु ( मणुस्साउ ) - आयुकर्म का भेद १०-१२ मनोयोग (मणोजोग)- चार प्रकार का सत्य, असत्य, उभय, अनुभय १२,१ मन्दकषाय ( मंद-) - स्वच्छाघव हेतु ७-२५ मरुदेव - १२ वें कुलकर व मनु पृ. ७ दि. मल-परीषह ८-३६,३७ मल्लि ( मल्लि) - १९ वें तीर्थकर १-४४ मल्ली - कुमार काल में महाव्रत १-६० महर्षि ( महोस )- महामुनि ४-१ महातमप्रभा (-पहा ) - सातवां नरक १-८ महावीर वर्धमान - चोवीसवें तीर्थकर १-६१,६२ महाव्रत ( महव्वद) - २४ वें तीर्थंकर वर्धमान द्वारा ग्रहण १-५९ (महश्वय) - मुनियों के पांच व्रत ५-२, ७-२९ महाशुक्र (महसुक्क) - ७ वां :वर्ग १-२० । -१० वां स्वर्ग १-२१ महाहिमवान् (महाहिमवंत)- हैमवत क्षेत्र के उत्तर में कुलाचल १-३२ माधवी (माघविय) - ७ वीं पृथ्वी का गोत्र नाम १-९ मान - चार प्रकार १२-२४ माया - चार प्रकार १२-२५ मार्गणा (मगणा) - चौदह प्रकार १२-१ मार्दव (महव) - धर्माग ६-१ For Private And Personal Use Only
SR No.020812
Book TitleTattva Samucchaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherBharat Jain Mahamandal
Publication Year1952
Total Pages210
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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