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लाड लडावशे. ॥ ८ ॥ हे दुर्दैव ! पुत्रोनो नाश करता एवा तें म्हारा मननो मनोरथ पण निष्फल कस्यो ! श्रर्थात् 'वृद्ध थएसा म्हारा शरीरने पुत्रो लाड लडावशे' एवो। जे में मनमां मनोरथ कस्यो हतो, ते पण व्हाराथी सहन न थइ शकवाने लीधे तें म्हारा पुत्रोनो नाश कस्यो े. ए प्रकारना शोकरूप पिशाच (नूत ) थी श्राश्रय
मनसोऽपि मनोरथस्त्वया, तनयान् संहरता कृतोऽफलः॥ इति शोक पिशाच संश्रितो, जैनको गाढतरं रुरोद सेः ॥ ए ॥ लयबाहुलता श्रियोनिता, विवशा पुत्रशुचा सुधीरिमाः ॥ सुलसापि पपात भूतले, केरिणोन्मीलितपद्मिनीव हैं ।॥ १० ॥
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| कराएला (ग्रसित थएला) ते नागसारथी पिताए अत्यंत रुदन कस्युं ॥ एए ॥ पुत्रना | शोकथी परखाधीन थपली, शीथिल थइ गइ बे हस्त रूप लता जेणीनी, शोजा र हित अने अत्यंत धीरजवाली सुलसा पण हस्तिए तोडी नांखेली कमलिनी ( पोय णी) नी पेठे पृथ्वी उपर पड़ी गई ! ॥ १० ॥
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