________________
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra
www.kobatirth.org
Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir
मन्त्र-बापम् । पुमाएमी मियावरणौ पुमालमा पसिना बुभौ ॥ मानग्निश्च वाथश्च पमान न संबोदर ॥८॥पमा
के वधु ! यथा 'मित्रावरुणी' अहोरात्रौ काली 'पुमांसौ' प्रज ननगक्तिमन्ती, तत्रैवैतत्समस्तस्थ जायमानत्वात् ; 'उभौ' यावापृथिवी 'अखिनौ प्रवाशिव वेगगामिनी 'मुमासो' पूर्ववत् । 'अग्निः' पार्थिवो देवः अपिच 'मायुखः अमरीक्षस्थी देवश 'पुमान्-'तष उदरे अपि एवमेव पुमान् नर्भः' भवतु ॥ ८ :
हे वधु ! यथा अग्निः पार्थिवो देवः 'पुमान्', यथा 'इन्द्रः' अन्तरोक्षस्थो देवो ‘पुमान्', यथा 'वृहस्पतिः' वृहता विपुलानां राशि चक्राणां पतिः पालकः मूर्यः दुखिोदेवः पुमान्'-एवमेव त्वमपि "पुमांस' प्रजनन-शक्तिमन्तं पुत्रं 'विन्दस्ख' लभख । किञ्च तं लब्ध पुत्रम् 'अनु अन्येऽपि 'पुमान्' पुमांसः पुत्राः 'जायताम्' तवोदरे इति शेषः ॥ ६ এই অম্বর-মাল্য-ধারী দ্যব্যাপৃথিবী তােমার গর্ভ ধারণ। करून ॥१
. । . হে বধু ! এই অহােরাকালেই সমস্ত প্রজা উৎপন্ন হইতেছে অতএব ইহা যেরূপ পুরুষ (প্রজনন ক্রিয়ক্ষম) এই অশ্বের ন্যায় বেগগামী এই দ্যাবাপৃথিবী যেরূপ পুরুষ এবং এই পৃথিবীর দেবতা অগ্নি ও অন্তরীক্ষের দেবতা বায়ু যেরূপ পুরুষ--তােমার উদরেও সেইরূপ পুরুষ অর্থাৎ প্রজননক্ষম গর্ড উৎপন্ন হউক ৮ | হে বধু ! এই পৃথিবীর দেবতা যেরূপ পুরুষ, অন্তরীক্ষের
For Private And Personal Use Only