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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६४५ प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ततस्तेषु भोगिनामदृष्टापेक्षादात्माणुसंयोगात् कर्मोत्पत्तौ तज्जेम्यः संयोगेभ्यो द्वयणुकादिप्रक्रमेण कार्यद्रव्यमुत्पद्यते, तस्मिंश्च रूपाधुत्पत्तिसमकालं कारणगुणप्रक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यत इति । स्नेहोऽपां विशेषगुणः। संग्रहमृजादिहेतुः । अस्यापि गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः । है। इसके बाद भोग करनेवाले जीवों के अदृष्ट की सहायता से आत्मा और मन के संयोग से ( उन स्वतन्त्र परमाणुओं में ) क्रिया की उत्पत्ति होती है। इस क्रिया से (द्रवत्व से युक्त परमाणुओं में द्रव्योत्पादक ) संयोग की उत्पत्ति होती है। इस संयोग से द्वयणुकादि क्रम से कार्यद्रव्य की उत्पत्ति होती है। इस कार्यद्रव्य में जिस समय रूपादिगुणों की उत्पत्ति होती है, उसी समय द्रवत्व की भी उत्पत्ति होती है। केवल जल में ही रहनेवाला विशेषगुण 'स्नेह' है। वह संग्रह सत्तू प्रभृति चूर्ण द्रव्यों को गोले का आकार बनाने का, एवं मर्दन प्रति क्रिया का हेतु है। उसके नित्यत्व और अनित्यत्व की व्यवस्था गुरुत्व की तरह जाननी चाहिए। न्यायकन्दली द्रव्यारम्भकः सङ्घाताख्यः, तेन हिमकरकारम्भकाणां परमाणूनां द्रवत्वप्रतिबन्धात् । तेज:संयोगेन परमाणूनां द्रवत्वं प्रतिबद्धमित्यन्यत्राप्यद्रव्यस्य लवणस्य वह्निसंयोगेन द्रवत्वप्रतिबन्धदर्शनादनुमितम् । लवणस्याप्यत्वमपि हिमकरकादिवत् कालान्तरेण द्रवीभावदर्शनादवगतम् । विलयनं तु हिमकरकादेभौ माग्निसंयोगाद् यद् विलयनं कठिनद्रव्यस्य, तद् वह्निसंयोगादवगतम, यथा सुवर्णादीनाम् । हिमकरकादिविलयनमपि विलयनमेव । तस्मादिहापि दृष्टसामर्यो वह्निसंयोग एव निमित्तमाश्रीयते। लवणरूप द्रव्य में वह्नि के संयोग से (सांसिद्धिक) द्रवत्त का प्रतिरोध देखा जाता है, अतः लवण रूप दृष्टान्त से तेज के संयोग में सांसिद्धिक द्रवत्व के प्रतिरोध की जनकता का अनुमान करते हैं। हिम, करकादि की तरह कुछ समय के बाद लवण को पिघलते देखा जाता है, अतः समझते हैं कि लवण भी जलीय द्रव्ध है। वह्नि संयोग से कठिन द्रव्य का पिघलना सुवर्णादि द्रव्यों में प्रत्यक्ष देखा जाता है। हिम, कारकादि का पिघलना भी कठिन द्रव्य का पिघलना ही है, अतः समझते हैं कि वह वह्नि के संयोग से ही पिघलता है। तस्मात् पिघलने की कारणता जिसमें प्रत्यक्ष के द्वारा निश्चित है, उसी वह्निसंयोग में हिम, करकादि के पिघलने की भी कारणता स्वीकार कर लेते हैं । For Private And Personal
SR No.020573
Book TitlePrashastapad Bhashyam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreedhar Bhatt
PublisherSampurnanand Sanskrit Vishva Vidyalay
Publication Year1977
Total Pages869
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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