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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ३६ ) संस्कार 'संस्कार' नाम का भी एक गुण है जिसके (१) वेग (२) भावना और (३) स्थितिस्थापक ये तीन भेद हैं । ( १ ) वेग नाम संस्कार क्रिया से उत्पन्न होता है और पृथिवी, जल, तेज, वायु और मन इन पाँच द्रव्यों में रहता है । (२) 'भावना' नाम का संस्कार आत्मा में रहता है। इसी के बल से स्वयं तीसरे क्षण में ही विनष्ट हो जाने पर भी पूर्वानुभव स्मृति को उत्पन्न करता है । ( ३ स्थितिस्थापक संस्कार के कारण ही बाँस प्रभृति द्रव्यों के अग्रभाग को बलात् नीचे से ले आकर छोड़ देने बाद वे फिर अपनी पहिले की स्थिति में आ जाते हैं। धर्म जीव के उस गुण को धर्म कहते हैं, जिससे उसे सुख मिलता है, इसी का दूसरा नाम पुण्य है । 'किन क्रियाओं से धर्म की उत्पत्ति होती है ?' इसको श्रुति स्मृति ही समझा सकते हैं । तदनुसार 'श्रुत्यादि प्रमाणों के द्वारा निर्दिष्ट क्रियाओं से उत्पन्न गुण ही 'धर्म' है इस प्रकार 'विहितकमजन्यो धर्मः' धर्म का यह लक्षण किया जाता है। __ अधर्म . अधर्म भी जीव का ही विशेष प्रकार का गुण है । जिससे जीवों को दुःख मिलता है। शास्त्रों में निषिद्ध जीवहत्यादि क्रियाओं से इसकी उत्पत्ति होती है। शब्द । श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत होनेवाले गुण को ही शब्द कहते हैं। यह संयोग से विभाग से और शब्द से उत्पन्न होता है । दण्ड और मेरी के संयोग से शब्द की उत्पत्ति होती है । एवं बाँस प्रभृति के विभाग से भी शब्द की उत्पत्ति होती है। किन्तु संयोग और विभाग से उत्पन्न शब्दव्यक्ति का श्रवण संभव नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष के लिए विषय के साथ इन्द्रिय का सम्बन्ध आवश्यक है । शब्द रूप विषय का ग्राहक श्रवणेन्द्रिय है । यह आकाश रूप है । आकाश अमूर्त्त होने के कारण कहीं जा नहीं सकता । अतः शब्द की उत्पत्ति जिस देशावच्छिन्न आकाश में होता है, वहाँ श्रवणेन्द्रिय जा नहीं सकता । किन्तु उस शब्द का प्रत्यक्ष तो होता है । इसलिए यह कल्पना करनी पड़ती है कि संयोग या विभाग से जिस शब्दब्यक्ति की उत्पत्ति होती है, उसी शब्द से उसी शब्द के सदृश दूसरे शब्द की उत्पत्ति अनन्तर प्रदेश में होती है । इस प्रकार एक शब्द से दूसरे शब्द की उत्पत्ति, और दूसरे शब्द से तीसरे शब्द की उत्पत्ति की धारा जल की तरङ्गों की तरह चलती है । उस धारा के अन्तर्गत जब किसी की उत्पत्ति कर्णवाले आकाश प्रदेश में होती है, तो उस शब्द का प्रत्यक्ष होता है। अतः संयोग और विभाग की तरह शब्द से भी शब्द की उत्पत्ति माननी पड़ती है। For Private And Personal
SR No.020573
Book TitlePrashastapad Bhashyam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreedhar Bhatt
PublisherSampurnanand Sanskrit Vishva Vidyalay
Publication Year1977
Total Pages869
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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