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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir दसशासीमा मिच्छोदयओ तो च्चिय भणियमिणं भावगहरूवं ॥ ४४७ ॥ णाणस्स फलं विरती पावे पुनम्मि तह पवित्तीओ | जोगत्तादि अनुबन्धे अणुगया भावेण ण सा अओऽण्णाणं ॥ ४४८ ॥ एवमतिाणउणबुद्धीऍ भाविउं अप्पणो हियट्ठाए । सम्मं पयट्टियव्वं आणाजोगेण | जीर्णश्रेष्टी सम्वत्थ ॥ ४४९ ॥ णाऊण अत्तदोस वीरियजोगं च खेत्त कालो य । तप्पच्चणीयभूए गिण्हेज्जाभिग्गहविसेसे ॥ ४५० ॥ पालिज अभिग्रहे य परिसुद्धे आणाण चेव सति पयत्तेणं । बज्झासंपत्तीयवि एत्थ तहा निज्जरा विउला ।। ४५१ ॥ तस्संपायणभावो अब्बोच्छिन्नो* यमुनावक्र: ॥१७॥ आज्ञा जओ हवाति एवं । तत्तोय निज्जरा इह किरियायवि हंदि विनेया ।। ४५२ ॥ आहरणं सेट्ठिदुर्ग जिणिदपारणगदाणदाणेसु । विहि प्राबल्यं | भत्तिभावऽभावा मोवस्त्रंग तत्थ विहिभत्ती ॥ ४५३ ॥ वेसालि वासठाणं समरे जिण पडिम सेट्टिपासणया। अतिभत्ति पारणदिणे मणोरहो अन्नहिं पविसे ॥४५४।। जा तत्थ दाणधारा लोए कयपुन्नगोत्ति य पसंसा । कवालआगम पुच्छण को पुन्ना? जुन्नसहित्ति ||४५५|| एत्थ हुमगारहो चिय अभिग्गही होति नवर विन्नेओ । जदि पविसति तो भिक्खं देमि अहं अस्स चिंतणओ ||४५६।। पञ्चग्गकयपि तहा पावं खयमेऽभिग्गहा सम्म । अणुबंधो य सुहो खलु जायह जउणो इंह नाय ।। ४५७ ।। मुहराए जउणराया जउ-| णावंके य डंडमणगारो। वहणं च कालकरणं सकागमणं च पबज्जा ।। ४५८ ।। जउणावंके जउणाएँ कोप्परे तत्थ परमगुणजुत्तो।। | आयावेति महप्पा दंडो नामेण साहुत्ति ॥ ४५९ ॥ कालेण रायणिग्गम पासणया अकुसलोदया कोवो । खग्गेण सीसछिन्दण अण्णे उ फलेण ताडणया ॥४६०॥ सेसाण लेदुखेवे रासी अहियासणाएँ णाणत्ति । अंतगडकेवलित्तं इंदागम पूयणा चेव ।। ४६१ ।। दट्टण रायलज्जा संवेगा अप्पवहपरीणामो। इंदनिवारण सम्म कुण पायच्छित्तमो एत्थ ॥ ४६२ ॥ साहुसमी गमणं सवणं तह चेव | ॥१७॥ पायछित्ताणं । किं एत्थ पायच्छित्तं ? सुद्धं चरणंति पव्वज्जा ।। ४६३ ॥ पच्छायावाइसया अभिग्गहो सुमरियम्मि नो भुंजे | दर AKASX For Private and Personal Use Only
SR No.020535
Book TitlePanchashak Mulam
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
Author
PublisherRushabhdev Kesarimal Jain Shwetambar Sanstha
Publication Year1928
Total Pages372
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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