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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir दृश्व२] बलभद्रदेशका राजकुमार। विशा०-नहीं महाराज, आप बहुत ठीक कहते हैं । यही है वह भाषका नम दास विशालाक्ष । जयन्त-मित्रवर, आजसे मैंने तुम्हारा नाम बदल दिया है; इसलिये अब तुम अपनेको सेवक न समझना । अच्छा, विशालाक्ष और · बीरसेन, मंगलापुरसे तुमलोग यहां किसलिये आए हो ? वीर०-महाराज जयन्त-वीरसन, तुम्हें देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ । परन्तु, मित्र, मंगलापुरसे तुमलोग यहां कैसे आए ? विशा०-ऐसे ही घूमते फिरते चले आए, महाराज । जयन्त-यह बात यदि तुम्हारा शत्रु भी कहेगा तो मैं सच न मानूंगा; और यदि तुम स्वयं ही अपने विरुद्ध ऐसी बनावटी बातें कहोगे तो, भला मैं उसमें कैसे विश्वास करुंगा ? मैं खूब जानता हूं कि तुम लोग फ्रजूल इधर उधर भटकनेवाले नहीं हो । परन्तु यह तो कहो कि तुमलोग यहां किस लिये आए हो । मित्र, तुम्हारे जानेके पहले एक दिन तुम्हारी दावत होगी। विशा०-महाराज, मैं आपके पिताकी अन्तिम क्रिया देखने आया था। जयन्त-मित्र, ऐसी हंसी क्यों करते हो ? सच कहो-मेरी माताका विवाहोत्सव देखने आए थे न ? विशा.-सचमुच, महाराज, इसमें बहुत शीघ्ता हुई। जयन्त-अजी, शीघ्रता किस बातकी ? एक खर्चमें दोनों काम निपट गए । श्राद्धके पक्वान्न विवाहमें और विवाहके श्राद्धमें । सचमुच, विशालाक्ष, वह दिन इन आँखोंसे देखनेकी अपेक्षा मेरा जन्म ही न हुआ होता या उसके पहिलेही इस शरीरसे प्राण निकल For Private And Personal Use Only
SR No.020403
Book TitleJayant Balbhadra Desh ka Rajkumar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGanpati Krushna Gurjar
PublisherGranth Prakashak Samiti
Publication Year1912
Total Pages195
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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