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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org ७० | जैन न्याय- शास्त्र : एक परिशीलन Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir लक्षण की परिभाषा अनेक प्रकार के मिश्रित पदार्थों में से किसी एक पदार्थ को अगले एवं पिछले पदार्थों से पृथक् करने वाले को लक्षण कहा गया है । उसके दो भेद हैं- आत्मभूत और अनात्मभूत । १. आत्म-भूत लक्षण - जो लक्षण वस्तु के स्वरूप में मिला हुआ हो, उसे आत्मभूत लक्षण कहा गया है । जैसे अग्नि का लक्षण उष्णता और जीव का लक्षण चैतन्य कहा जाता हैं । 1 २. अनात्मभूत लक्षण - जो लक्षण वस्तु के स्वरूप में मिला हुआ न हो, उसको अनात्मभूत लक्षण कहते हैं । जैसे दण्डी पुरुष का लक्षण दण्ड । यहाँ दण्ड, पुरुष से अलग है । फिर भी वह दण्डी को अन्य पुरुषों से अलग करके उसकी पहचान करा ही देता है । लक्ष्य का ज्ञान, लक्षण से ही किया जा सकता है । लक्षणाभास सदोष लक्षण को लक्षणाभास कहा गया है । लक्षणाभास के तीन भेद हैं - अव्याप्ति, अतिव्याप्ति और असम्भव । जैसे कि कहा है १. अव्याप्ति -- लक्ष्य के एकदेश में लक्षण के रहने को अव्याप्ति दोष कहते हैं । जैसे पशु का लक्षण सींग कहना । समस्त पशुओं में सींग नहीं होते । जीव का लक्षण पञ्चेन्द्रियत्व को कहना । जीवत्व एकेन्द्रिय में भी होता है । २. अतिव्याप्ति - लक्ष्य और अलक्ष्य दोनों में, लक्षण के रहने को अतिव्याप्ति दोष कहते हैं । जैसे गाय का लक्षण सींग । लक्ष्य गाय में सींग है, लेकिन अलक्ष्य भैंस में भी सींग है । ३. असम्भव - लक्ष्य मात्र में कहीं पर भी लक्षण के सम्भव न होने को असम्भव दोष कहते हैं । जैसे अग्नि का लक्षण शीतलता । वस्तु के स्व-पर चतुष्टय जैन दर्शन, अनेकान्त दर्शन है । इसके अनुसार वस्तु में अनेक धर्म रहते हैं । अपेक्षाभेद से परस्पर विरुद्ध प्रतीत होने वाले धर्मों का भी एक ही वस्तु में सामञ्जस्य होता है, समन्वय किया जाता है । जैसे अस्ति और नास्ति । जैसे घट पदार्थ स्वचतुष्टय की अपेक्षा, अस्ति धर्म वाला है, और पर चतुष्टय की अपेक्षा, नास्ति धर्म वाला है । प्रत्येक वस्तु स्वद्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा है, और परद्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा नहीं है । For Private and Personal Use Only
SR No.020394
Book TitleJain Nyayashastra Ek Parishilan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaymuni
PublisherJain Divakar Prakashan
Publication Year1990
Total Pages186
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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