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वासुकी - विंशति
वासुकी - पु० दे० 'वासुकि' ।
वासुदेव-पु० [सं०] वसुदेव-पुत्र, कृष्ण; अश्वत्थ वृक्ष (बो०)। वास्कट - स्त्री० [अं० 'वेस्टकोट' ] फतूही, बिना आस्तीनका परिधान जिसे कोटके नीचे और कमीजके ऊपर पहनते हैं ।
वास्तव - वि० [सं०] यथार्थ, सत्य, निश्चित । पु० असल तत्त्व, परमार्थभूत वस्तु । - मेँ - सत्यतः, यथार्थतः,
सचमुच ।
वास्तविक - वि० [सं०] सत्य, परमार्थभूत; यथार्थ, ठीक। वास्तव्य - वि० [सं०] किसी स्थानपर छोड़ा हुआ (निकम्मा समझकर ); बसा हुआ, आबाद; रहनेवाला; वास योग्य । वास्ता - पु० [अ०] संबंध, लगाव; नाता; जरिया; काम, सरोकार; विचुआ, मध्यस्थ । मु-देना- बीचमें डालना; दुहाई देना । - पड़ना - काम पड़ना, सरोकार होना । वास्तु-पु० [सं०] मकान बनाने योग्य स्थान; गृह, भवन; मकान की नीव; कमरा; एक वसु; बथुआ; पुनर्नवा; एक अन्न । -कर्म(न्)-पु० गृहनिर्माण । कर्मकार, कर्मज्ञ - पु० (आर्किटेक्ट) इमारत, पुल आदि बनानेकी कला जाननेवाला । -काल- पु० गृहनिर्माणके लिए उपयुक्त समय । - विद्या - स्त्री०, - शास्त्र- पु० गृहनिर्माणसंबंधी विद्या ।
वास्ते - अ० [अ०] लिए, हेतु, कारण ।
वास्तोष्पति -पु० [सं०] इंद्र |
वाह - अ० [फा०] साधु, धन्य, शाबाश ( प्रशंसासूचक अव्यय । कभी-कभी आश्चर्य और व्यंग्य में निंदाका भाव भी प्रकट करता है) । - वाह-अ० साधु-साधु, धन्य धन्य, क्या कहना है ! - वाही - स्त्री० वाह-वाह होना, बहुतों के मुँह से वाह-वाह निकलना, साधुवाद | वाहक- वि० [सं०] ढोने, ले जानेवाला; बहानेवाला; गति प्रदान करनेवाला । पु० बोझ ढोनेवाला, भारवाहक; सारथि या आरोही; एक विषैला कीड़ा । - धनादेश - पु० (बेयरर चेक ) वह धनादेश (चेक) जिसका रुपया किसी भी ऐसे व्यक्तिको दिया जा सकता है जो उसे ले जाकर बैंक के सामने उपस्थित करे। -नलिका - स्त्री० (जाइनिंग ट्यूब ) एक पात्रसे दूसरे पात्र में ले जाने, पहुँचानेवाली नलिका ।
संख्या; खुदाका एक नाम ।
• वाहिदिया- पु० मुसलमानोंका एक संप्रदाय । वाहिनी - स्त्री० [सं०] सेना; सेनाका एक विभाग (८१ हाथी, ८१ रथ, २४३ घोड़े, ४०५ पैदल ); नदी । - निवेश - पु० सेनाका पड़ाव, शिविर । पति -पु० सेनानायक; (ब्रिगेडियर ) वह सेनानायक जो वाहिनी (ब्रिगेड ) का नेतृत्व करे; समुद्र ।
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वाहिनीश - पु० [सं०] सेनानायक । वाहियात - वि० [फा०] 'वाहीयत' का बहु०, बेहूदा, निकम्मी (बातें) । स्त्री० खुराफात; बदमाशी आवारगी । वाही - वि० [अ०] टूटा-फूटा हुआ; कमजोर; निकम्मा; - बेहूदा, बेसिर-पैर की (बात); आवारा, बदचलन । - तबाही - वि० निरर्थक बेहूदा (बातें) (-बकना, हाँकना ) । वाही ( हिन्) - वि० [सं०] वहन करनेवाला ढोनेवाला; बहनेवाला; बहानेवाला ।
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वाहु-स्त्री० [सं०] दे० 'बाहु' । वाह्य-पु० [सं०] यान, सवारी; घोड़ा, हाथी आदि भारवाहक पशु । वि० खींचा, ढोया या चढ़ा जानेवाला; दे० 'बाह्य' ।
वाहन - पु० [सं०] घोड़ा, रथ या अन्य कोई सवारी; ढोना; •ले जाना; सवारीके काम आनेवाला या माल ढोनेवाला जानवर; प्रयल, उद्योग करना । - कार - पु० रथादि बनानेवाला । - श्रेष्ठ - पु० घोड़ा । वाहना- स्त्री० [सं०] सेना । * स क्रि० दे० ' बाहना' । वाहिता (तृ) - पु० [सं०] चलानेवाला, नायक । वाहिद - वि० [अ०] एक, अकेला, अद्वय । पु० एककी बिंबा, विंबी - स्त्री० [सं०] दे० 'बिंबा' ।
विध्याटवी स्त्री० [सं०] विंध्य पर्वतपरका जंगल । विध्याद्रि - पु० [सं०] विंध्य पर्वत । विध्यारि- पु० [सं०] अगस्त्य मुनि । विंबक - पु० [सं०] दे० 'बिंबक' | विंब - पु० [सं०] दे० 'बिंब' |
वाह्यांतर - वि० [सं०] बाहर-भीतरका । अ० बाहर-भीतर । वायेंद्रिय - स्त्री० [सं०] बाह्य विषयोंका ग्रहण करनेवाली पाँच ज्ञानेंद्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा) । बिंदक- पु० [सं०] प्राप्त करनेवाला; *जाननेवाला, वेत्ता । बिंदु-पु० [सं०] एक बूँदका परिमाण; हाथीके शरीरपर बनायी हुई रंगकी बिंदी; अनुस्वारका चिह्नः शून्य; जलाने से बना हुआ बिंदी जैसा चिह्न; भौंहोंके बीच बनी हुई बिंदी; रलका एक दोष; छोटा टुकड़ा; मूँजका धुआँ; (पाइंट) रेखागणित में वह अत्यंत छोटा कल्पित स्थान जिसमें केवल स्थिति हो, किंतु लंबाई, चौड़ाई, मोटाई न हो; दे० 'बिंदु' । - पातक - पु० (ड्रॉपर) आँख, कान आदिमें दवा छोड़ने की शीशेकी वह नलिका जिसमें ऊपरकी ओर रबड़ लगा रहता है (इसे दबानेसे एक-एक बूँद टपकाने में आसानी होती है) । विंदुर-पु० बुँदकी, वेंदी | विध* - पु० विंध्याचल |
विंध्य - पु० [सं०] भारतके मध्य में स्थित एक पर्वतश्रेणी जो उत्तर भारतको दक्षिणसे अलग करती है। -कूट, - कूटक, कूटन - पु० अगस्त्य मुनि । - गिरि, पर्वत, - शैल - पु० विध्यश्रेणी । - निवासी (सिन्) - पु० दे० 'विंध्यवासी' । - वासिनी स्त्री० देवीको एक मूर्ति । - वासी (सिन्) - वि० विंध्यपर रहनेवाला । विंध्याचल-पु० [सं० ] विंध्य पर्वतः विंध्य पर्वतकी एक शाखापर स्थित एक बस्ती जहाँ विंध्यवासिनी देवीका मंदिर है।
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विंबित - वि० [सं०] दे० 'बिंबित' । बिष्ट, विष्ट - वि० [सं०] दे० 'बिंबोष्ठ' | विंश- वि० [सं०] बीसवाँ । पु० बीसवाँ भाग । विंशति - वि० [सं०] बीस; बीसकी संख्याका । स्त्री०बीसकी संख्या; वीसकी संख्याका सूचक अंक, २०; एक प्रकारका व्यूह । - बाहु, - भुज-पु० रावण । - वार्षिक - वि० बीस वर्ष टिकनेवाला ।