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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir भनगारधर्मामृतवषिणी टीका अ० ८ मिथिलानिरोधवर्णनम् ४५९ पति निशान्ते जनानां निद्रोपगतत्वेन सर्वथा जनध्वनिसंचाररहिते यस्मिन् काले कोऽपि मार्गे दूतं न पश्येदिति भावः, प्रत्येकं मिथिला राजधानीमनुप्रवेशयत, अनुप्रवेश्य गर्भगृहेषु अभ्यन्तरवर्तिभवनेषु अनुप्रवेशयत, तत्तो मिथिलाया राज. धान्या द्वाराणि पिधत्त, आच्छादयत पिधाय रोधसज्जा-रोधेन प्रतिरोधेनाऽऽत्मरक्षां कुर्वन् तिष्ठत । ततः=मल्लीवाक्यश्रवणानन्तरं खलु कुम्भको राजा मल्ल्या भेजिये ( एगमेगं एवं यदह-तव देमि मल्लिं विदेहरायवरकण्णं त्तिकटु संझाकालममयंसि पविरल मणूसंमि निसंतसिं पडि निसंतंसि पत्तेयं २ मिहिलं रायहाणिं अणुप्पवेसेह) वह दूत जाकर उन प्रत्येक से ऐसाकहे कि हम अपनी पुत्री विदेह राजवर कन्या मल्ली कुमारी तुम्हें देंगें। ऐसा कहकर ( दूतों से कहलवा कर ) फिर उन राजाओं में से प्रत्येक राजा को आप ऐसे संध्याकाल के समय में-जब कि सूर्य बिलकुल अस्त हो गया हो-रात्रि का समय आ गया-हो मार्ग में भी कहीं कहीं पर ही थोड़े से मनुष्य का संचार हो रहा हो-मकान भी मनुष्यों की कल कल ध्वनि से रहित हो चुके हों-सबों के निद्राधीन बन जाने से जिन में से जन ध्वनि बिलकुल ही नहीं प्रकट हो रही हो अपनी मिथिला नगरी में घुलवाई ये-उन्हें प्रवेश कराईये (अणुप्पवेसित्ता गम्भघरएस्सु अणुप्पवेसेह, मिहिलाए रायहाणीए दुवाराई पिहेह पिहित्ता रोहसज्जे चिट्ठह तएणं कुंभए एवंतं चेव जाव पवे सेह, रोहसज्जे चिट्ठह ) प्रवेश करवा कर उन्हें आप गर्भ गृहों में-ठहरा दीजिये । (एगमेगं एवं वदह तब देभि मल्लि विदेहरायवरकण्णं तिकटु संझाकाल समयसि पविरलमणूसंसि निसंतसिं पडिनिसंतसि पत्तेयं २ मिहिलं रायहागि अणुप्पवेसेह ) તે દૂત તેમની પાસે જઈને દરેકને આ પ્રમાણે કહે કે અમારી કન્યા વિદેહરાજવર કન્યા મલીકુમારી તમને આપીશું. આ પ્રમાણે દૂત વડે દરેકની પાસે સંદેશ મોકલીને તે રાજાઓમાંથી દરેકને તમે સંધ્યાકાળના સમયે જ્યારે સુરજ બરોબર અસ્ત થઈ ગયે હાય, રાત્રિનો વખત થઈ ગઈ હોય, માર્ગમાં બહુ જ થોડા માણસની અવર જવર થવા માંડી હોય, માણસના ઘોંઘાટથી ઘરે પણ જ્યારે શાંત થઈ ગયા હોય ત્યારે મિથિલા નગરીમાં બોલાવે. ( अणुप्पवेसित्ता गब्भघरएसु अणुप्पवेसेह, मिहिलाए रायहाणीए. दुवाराई पिहित्ता रोहसज्जे चिट्ठह तएणं कुंभए एवं० तं चेव जाव पवेसेह, रोहसज्जे चिट्ठइ) બેલાવીને તેઓને તમે ગર્ભગૃહમાં રોકે, For Private And Personal Use Only
SR No.020353
Book TitleGnatadharmkathanga Sutram Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanahaiyalalji Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1963
Total Pages845
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_gyatadharmkatha
File Size24 MB
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