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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ३७६ रे, निसुणी समज्या भवि प्राणी रे, आठम दिन अति गुण खाणी । भवि० ॥ ५॥ आठ कर्म ते दुर पलाय रे, एथी अम सिद्धि अडबुद्धि थाय रे, ते कारण सींचो चित्त लाय ॥भवि०॥६॥ श्री उदयसागर सूरी रायारे, गुरु शिष्य विवेकें ध्यायारे, तस न्यायसागर जय थाया ॥ नवि०॥७॥ इति संपूर्ण ॥ ॥ अथ श्री एकादशीनुं स्तवन । ॥ ढाल १ ली || चंद्राउलानी देशी ॥ ॥ द्वारिका नगरी समोसा रे, बावीशमा जि. णचंद ॥ बेकर जोडी भावशुंरे, पूछे कृष्ण नरिंद ॥ ॥त्रुटक ॥ पूछे कृष्ण नरिंद विवेके, स्वामी अग्यारश मानी अनेके ॥ एह तणो कारण मुज भाखो, महिमा तिथिनो यथारथ दाखो ॥ जी जिणंदजी जीरे ॥१॥ ( महिमा सुणवा तास भविक मन उबसेरे, अगीया. रश दिन सार सदा हश्यडे वसेरे ) ए आंकणी ॥ नेम कहे केशव सुणो रे, पवे वहुं छे तेण ॥ कल्या. णक जिननां कह्यां रे, दोढशो एणे दिन जेण || ॥ त्रुटक ॥ दोढशो एणे दिन सुत्र प्रसिद्धा, कल्या For Private And Personal Use Only
SR No.020137
Book TitleChaityavandan Stuti Stavanadi Sangraha Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPurvacharya
PublisherMaster Umedchand Raichand
Publication Year1932
Total Pages539
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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