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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ३५६ जितशत्रु राजवी ॥ भद्रामाय लख पचवीश, वरस स्थिति धरी ॥ नंदन नामे पुत्रे, दीक्षा आचरी ॥४॥ अगीयार लाख ने एंशी, हजार छस्से वळी ॥ ऊपर पीस्ताळीश, अधिक पण दिन रूळी ॥ वीश स्थानक मास खमणे, जावजीव साधता ॥ तीर्थकर नाम कर्म, तिहां निकाचता ॥ ५ ॥ लाख वरस दीक्षा पर्याय ते पाळता ॥ छवीशमे भव, प्राणत कल्पे देवता ॥ सागर वीशनुं जीवित, सुख भर भोगवे ॥ श्री शुभवीर जिनेश्वर, भव सुणजो हवे ॥६॥ ॥ ढाल पांचमी ॥ गजरामारुजी चाल्या चाकरी रे ॥ ए देशी ॥ नयर माहणकुंममा वसे रे, महा रुद्धि रूषभदत्त नाम ॥ देवानंदा द्विज श्राविकारे, पेट लीधो प्रभु विसराम रे ॥ पेट लीधो प्रभु विसराम ॥ १ ॥ व्याशी दिवसने अंतरे रे, सुर हरिणगमेषी आय ॥ सिद्धारथ राजा घरे रे, त्रिशला कूखे छटकाय रे ॥ त्रि० ॥२॥ नव मासांतरे जनमीयारे, देव देवीये ओच्छव कीध ॥ परणी यशोदा जोवने रे, नामे महावीर प्रसिद्ध रे ॥ ना० ॥ ३॥ संसार लीला भोगवी For Private And Personal Use Only
SR No.020137
Book TitleChaityavandan Stuti Stavanadi Sangraha Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPurvacharya
PublisherMaster Umedchand Raichand
Publication Year1932
Total Pages539
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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