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तैलप्रकरणम्
चतुर्थों भागः
जवाखार और तिन्तडीक का कल्क मिलाकर मन्दाग्नि (५३१९) मुस्तकादितैलम् पर पकायें। जब पानी जल जाए तो तेलको
(व. से. । नेत्ररो.) छान लें।
मुस्ता तेजोवती पाठा कट्फलं कटुका वचा। इसकी मालिशसे खल्ली ( हैजे इत्यादि में सर्वपा पिप्पलीमलं पिपली सैन्धवाग्निकौ ॥ होने वाली हाथ पैरोंकी ऐंठन ) तुरन्त शान्त हो तुत्थं करञ्जबीजश्च लवणं भद्रदारु च । जाती है।
एतैः कृतं कषायञ्च कवले तच्च धारयेत् ॥ (मधुशुत ' बनानेकी विधि “ मकारादि हितं शिरोविकारे च तैलमे भिर्विपाचयेत् ।। आसवारिष्ट प्रकरण" में देखिये । )
नागरमोथा, मालकंगनी, पाठा, कायफल, मिश्रकस्नेहः
कुटकी, बच, सरसो, पीपलामूल, पीपल, सेंधानमक, (यो. त. । तं. ४६; वृ. यो. त.; यो. र.) चीतामूल, नीलाथोथा, करञ्जबीज, सेंधा नमक और भा. भै. र. भाग ३ प्रयोग संख्या २४५९
देवदारु समान भाग लेकर, सबको अधकुटा करके " त्रिवृतादि मिश्रक स्नेह ” देखिये ।
८ गुने पानी में पकावें । जब चौथा भाग शेष रह
जाए तो छान लें। (५३१८) मुण्डीतैलम्
इस क्वाथके कवल धारण करने अथवा इन्हीं (र. र. । स्त्री रोगा.)
ओषधियोंसे सिद्ध तेल की मालिश करनेसे शिरोरोग मुण्डीमूलं दशपलं जले पच्याचतुर्गुणे । (प्रतिश्याय) नष्ट होता है। अर्द्धशेष हरेत्या काथा तिलतैलकम् ॥ क्वाथार्थ-प्रत्येक ओषधि ३२ तोले, जल तैलशेषं भवेत्तच नस्ये पाने च दापयेत् । । ४८ सेर, शेष १२ सेर । पतितं यौवनं स्त्रीणां मासादुत्तिष्ठते स्वयम् ॥ कल्कार्थ-प्रत्येक ओषधि २ तोले ।
५० तोले मुण्डीकी जड़को कूट कर ४०० तेल-३ सेर तोले ( ५ सेर ) पानीमें पकावें । जब २॥ सेर (५३२०) मूलकाद्यं तैलम् (१) पानी शेष रह जाए तो छान लें।
( च. द. । वातव्या.; च. स.) १। सेर तिलके तैलमें यह क्याथ मिलाकर मूलकस्वरसं तैलं क्षीरदध्यम्लकाभिकम । मन्दाग्नि परे पकावें । जब पानी जल जाए तो तुल्यं विपाचयेत्कल्कैवलाचित्रकसैन्धवैः॥ तेलको छान लें।
पिप्पल्यतिविषारास्नाचविकागुरुचित्रकैः । इसकी नस्य देने और इसे पिलानेसे १ मास भल्लातकवचाकुष्ठश्वदंष्टा विश्वभेषजैः ॥ . में स्त्रियोंके शिथिल स्तन स्वयमेव ही कठोर हो पुष्कराहशठीबिल्वशताहानतदारुभिः। . जाते हैं।
तत्सिद्धं पीतमत्युग्रान्हन्ति वातात्मकान्गदान् ।।
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