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रसपकरणम् ] तृतीयो भागः।
[५१९] प्रमेहगजसिंहो रसः निष्कमा हरेन्मेहान्मेहबद्धरसो महान् । (र. र. । प्रमेह.)
महानिम्बस्य बीजानि पिष्ट्वा षट्सम्मितानि च। " मेहद्विरदसिंहरस” देखिये ।
पलतन्दुलतोयेन घृतनिष्कद्वयेन च । (४४६३) प्रमेहगजसिंहो रस:
एकीकृत्य पियेचानु हन्ति मेहं चिरन्तनम् ॥
पारदभस्म, कान्तलोहभस्म, मुण्डलोहभस्म, (र. र. स. । अ. १७; र. रा. सु. । प्रमेह.)
शिलाजीत, सोनामक्खीभस्म, शुद्ध मनसिल, सेठ, चाण्डालीराक्षसीपुष्परसमध्वाज्यटङ्कणम् ।।
मिर्च, पीपल, हरे, बहेड़ा, आमला, अकोलके बीज रसं समांशोपरसं समं हेम्ना विमर्दितम् ॥
कैथ और हल्दी समान-भाग लेकर प्रथम कूटने समांशं पूतिलोहं वा मूषायां विपनेत्क्रमात् । योग्य ओषधियोंको कूटकर चूर्ण बना लें फिर सब प्रमेहगजसिंहोयं रसः क्षौट्टैद्विमाषकम् ॥ को एकत्र मिलाकर भंगरेके रसकी २० भावना
शिवलिंगी और चोरकके फूलोंका रस, घी, देकर ४-४ माशेकी गोलियां बना लें। शहद, सुहागा, शुद्ध पारा, और उपरस१ समान इसे शहदके साथ खाकर ऊपरसे बकायनके भाग तथा सोनाभस्म या नाग अथवा वङ्गभस्म इन ६ बीजोंको ५ तोले चावलेोके पानीके साथ पीससबके बराबर लेकर सबको खरल करके एक गोला कर उसमें ८ माशे घी मिलाकर पीनेसे समस्त बनावें और उसे शराब सम्पुट में बन्द करके १ प्रकारके प्रमेह नष्ट होते हैं। दिन भूधरयन्त्रमें पका।
(व्यवहारिक मात्रा-१ माशा) इसमेंसे २ माशे दवा शहदके साथ सेवन
नोट-र. र. स.; र. चि.; र. म. और धन्वकरनेसे समस्त प्रकारके प्रमेह नष्ट होते हैं।
| न्तरिमें इसे 'प्रमेहवन' नामसे लिखा है। वृ. (व्यवहारिक मात्रा–१ रत्ती।) । यो. त. में इसीको ‘मेघनादरस' नाम दिया (४४६४) प्रमेह बहरसः (प्रमेहबजरसः) गया है । वृ. यो. त. में मुण्डलोहकी जगह तीक्ष्ण (शा. ध. । म. ख. अ. १२; र. र. स.; र. म.; लोह तथा गन्धक अधिक लिखा है । र. का.; र. प्र. सु.; वृ. नि. र.; र. रा. सु.।।
रसमञ्जरीमें मुण्डभस्मकी जगह ताम्रभस्म प्रमेहा.; वृ. यो. त. । त. १०३)
लिखी है। रसेन्द्रसारसंग्रह आदि कई ग्रन्थों में भस्ममूतं मृतं कान्तं मुण्डभस्म शिलाजतु ।।
- अकोलकेबीजोंके स्थानमें बेल और जीरा लिखा है। शुद्धं ताप्यं शिला व्योष त्रिफलाङ्कोलबीजकम् ।।
(४४६५) प्रमेहसिन्धुतारकरसः कपित्यं रजनीचूर्ण भूराजेन भावयेत् ।।
(र. का. धे. । अ. २९) विशद्वारं विशोप्याथ मधुयुक्तं लिहेत्सदा ॥
रसो निष्काष्टादशको गन्धफस्य च विंशतिः । 1 उपरस-गन्धक, सोनागेरु, कसोस, फटकी, | हरताल, मनसिल, सुरमा, मुर्दासिंग ।
तालसत्वाश्च दशद्वौ तद्वत्सोममलस्य च ॥
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