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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir नस्यपकरणम् ] तृतीयो भागः। [४०३] इसे आंखमें आंजने से ज्वर नष्ट होता है। । (४२४७) प्रवालाद्यञ्जनम् (४२४६) प्रभावती गुटिका (३. मा.; वं. से. । नेत्र.) ( ग. नि. । नेत्ररोगा.) प्रवालमुक्तावैडूर्यशङ्खस्फटिकचन्दनम् । मनःशिला देवकाष्ठं रजन्यौ त्रिफलोषणम् ।। । सुवर्ण रजतं क्षौद्रमञ्जनं शुक्तिकापहम् ॥ लाक्षालशुनमभिष्ठासैन्धवैलाः समाक्षिकाः॥ रोधं शाबरजं चूर्णमायसं ताम्रमेव च।। __ मूंगा, मोती, वैडूर्यमणि, शंख, स्फटिकमणि, कालानुसारिवं चापि कुक्कुटाण्डदलान्यपि ॥ | चन्दन, सोना और चांदी । सबके महीन चूर्णको तुल्यानि पयसा पिष्टा गुटिकेयं प्रभावती।। शहदमें मिलाकर आंखमें आंजनेसे शुक्तिका का कण्डूतिमिरशुक्रामरक्तराजीजिदानात् ॥ नाश होता है। मनसिल, देवदारु, हल्दी, दारुहल्दी, हरे, (४२४८) प्रसादनाअनम् बहेड़ा, आमला, कालीमिर्च, लाख, ल्हसन, मजीठ, सेंधानमक, इलायची, सोनामक्खी, पठानी लोध, (शा. ध. । ख. ३ अ. १३) लोहचूर्ण, ताम्रचूर्ण, तगर और मुरगीके अण्डेके | कनकस्य फलं घृष्ट्वा मधुना नेत्रमञ्जयेत् । छिलके । सबका समान भाग मिश्रित अत्यन्त ईषत्कर्पूरसहितं स्मृतं नेत्रप्रसादनम् ।। महीन चूर्ण लेकर उसे दूधके साथ घोटकर गुटिका बनावें । निर्मलीके फलको शहदमें घिसकर उसमें ___इसे आंखमें लगानेसे आंखकी खाज, तिमिर, जरासा कपूर मिलाकर आंखमें आंजने से नेत्र शुक्र, अर्म और लाल रेखाएं नष्ट होती हैं। स्वच्छ होते हैं। इति पकाराघानप्रकरणम् । अथ पकारादिनस्यप्रकरणम् (४२४९) पलितनाशकनस्यम् गुडहरके फूलों के स्वरसमें समान भाग शहद (र. र. । क्षुद्र.) मिलाकर उस की नस्य लेने से १ मासमें, अन्य ओंडकुसुमस्वरसो मधुतुल्यो नस्यतः पलितम् । सैकड़ों औषधों से न आराम होने वाला पलितरोग योगशतैरप्यजितं मासाज्जयति नाश्चर्यम् ॥ । भी अवश्य नष्ट हो जाता है । For Private And Personal Use Only
SR No.020116
Book TitleBharat Bhaishajya Ratnakar Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNagindas Chaganlal Shah, Gopinath Gupt, Nivaranchandra Bhattacharya
PublisherUnza Aayurvedik Pharmacy
Publication Year1928
Total Pages773
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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