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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir [ ३२६] भारत-भैषज्य-रत्नाकरः। तकारादि क सन्निपातप्रशमनं विज्ञेयं नवकार्षिकम् । (२२६०) त्रिफला (सु. सं. । सू. स्था. ३८) एतदेव कपायन्तु सर्पिपा सह योजितम्॥ हरीतक्यामलकविभीतकानि त्रिफला ॥ वातपित्तसमुत्थस्य ज्वरस्य त्वमृतोपमम् । त्रिफला कफपित्तनी मेहकुष्ठविनाशिनी। सुखोष्णलवणं दद्याद्वातश्लेष्मोद्भवे ज्वरे ॥ चक्षुष्या दीपनी चैव विषमज्वरनाशिनी ॥ शर्करा संयुतं पीतं पित्तज्वरविनाशनम् । हर्र, बहेड़ा और आमला मिलकर "त्रिफला" क्षौद्रेण सह संयुक्तं श्लेष्मज्वरहरं परम् ॥ गोमूत्रेण समायुक्तं सन्निपातज्वरापहम् ॥ त्रिफला कफ, पित्त, प्रमेह, कुष्ठ और विषम निम्न लिखित त्रिकार्षिक, पञ्चकार्षिक, सप्त- ज्वरनाशक तथा नेत्रोंके लिए हितकारी और कार्षिक या नव कार्षिक कषाय समस्त प्रकारके | दीपन है। ज्वरोंको नष्ट करनेके लिए अमृतके समान गुण- | (२२६१) त्रिफलाकल्कः कारी हैं। (वृ. नि. र.; यो. र. । मूत्रकृ.) १ पटोलपत्र, मुलैठी और कुटकी। तीनों त्रिफलाया सुपिष्टाया:कल्क कोलसमन्वितम् । चीजें १-१ कप लेकर काथ बनावें । इसका | वारिणा लवणीकृत्य पिबेन्मूत्ररुजापहम् ॥ नाम “त्रिकार्षिक ___ त्रिफला और बेरको पानीमें कल्क (पिट्ठी)की २-इसी काथमें १-१ कप मोथा और हरी भांति पीसकर उसे सेंधा नमकसे नमकीन करके भी मिला लिया जाय तो इसका नाम “पञ्चकार्षिक" | पानीके साथ पीनेसे मूत्रकृच्छ्र नष्ट होता है । हो जाता है। (२२६२) त्रिफलाकषायः (यो.र.;वं.से.नेत्र) ३-पञ्चकार्षिक काथमें नीमके पत्ते और | त्रिफलायाःकषायस्तु धावनान्नेत्ररोगजित् । खस मिलाने से “ सप्तकार्षिक " हो जाता है। कवलान्मुखरोगन्नःपानतःकामलापहः॥ ४-सप्त कार्षिकमें सप्तपर्ण (सतौने) की छाल त्रिफलाके कषायसे आंखें धोनेसे नेत्ररोग, और अमलतासके फलका गूदा (गर्भ) मिलानेसे वह " नवकार्षिक" क्वाथ कहलाता है । यह | कुल्ले करनेसे मुखरोग और पीनेसे कामला रोग क्वाथ सन्निपात के लिए विशेष उपयोगी है। नष्ट होता है। उपरोक्त काथोंमें घी डालकर पिलानेसे वह | (२२६३) त्रिफलाकाथः (वं. से. । नेत्र.) वातपित्त ज्वरमें अमृतके समान लाभ पहुंचाते हैं। पथ्यास्तिस्रो विभीतक्याषट् धाग्यो द्वादशैव तु । इन्हें वातकफ ज्वरमें जरासा सेंधा लवण प्रस्था? सलिले काथ्यमष्टभागावशेषितम् ॥ मिलाकर ( कुछ गर्म ) पिलाना चाहिए । पित्त । पित्ताभिष्यन्दमात्रा रोग वा तिमिरं जयेत् । ज्वरमें मिश्री मिलाकर, कफज ज्वरमें शहद मिला सरम्भदाहशूलासृनाशनं दृक्प्रसादनम् ॥ कर और सन्निपात ज्वरमें गोमूत्र मिलाकर सेवन हर्र ३ नग, बहेड़े ६ नग और आमले १२ कराना चाहिए। नग लेकर उनकी गुठली निकालकर, अधकुटा For Private And Personal
SR No.020115
Book TitleBharat Bhaishajya Ratnakar Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNagindas Chaganlal Shah, Gopinath Gupt, Nivaranchandra Bhattacharya
PublisherUnza Aayurvedik Pharmacy
Publication Year1928
Total Pages597
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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