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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir अ०९ सूत्रस्थान भाषाटीकारुमत । (९३) जैसे ब्रीहि मधुररसयुक्त है पर इसका बिपा- गुणवाला द्रव्य अत्यगुणवाले द्रव्यका पराक अम्ल है हरीतकी कषायरस युक्त होतीहै । भव कर देता है अर्थात् प्रवल अपने अनुपर इसका बिपाक मधुर है।सोंठ अदरख पी- सार काम करता है । पल कटुरसयुक्त होनेपरभी मधुरपाकी है । रसादिमें उत्कर्षता। भिन्न २ बिधाकों के कर्म । रस विधाकस्तो वीर्य प्रभावस्ताग्व्यपोहति । रसैरसौ तुल्यफलस्तत्र द्रव्यं शुभाशुभम् ।। बलसाम्ये रसादीनामिति नैसर्गिक बल २५ किंचिद्रसेन कुरुते कर्म पाकेन वाऽपरम्२२ अर्थ- यदि रस, विपाक, वीर्य और गुणांतरेण वीर्येण प्रभावेणैव किंचन । - अर्थ-जिह्वा से जानने योग्य मधुराम्ल प्रभाव इनका बल समान हो तो (१) विकटुकादि स्वाभाविक रस जो कार्य करते हैं। पाक, रसको काम करनेमें कुंठित करदेताहै वही कार्य विधाकजनित वेही रस करते हैं जै- जैसे मधुका कटु विपाक उसके मधुर रसको से मधुररसयुक्त शर्करा का मधुररस वायुना- पराभव करदेताहै इसलिये मधुरहेतुबाले वातशक होता है तैसेही कटुरसयुक्त पीपल का नाशक कार्यको न करके कटुविपाक हेतु बिपाक से उत्पन्न हुआ मधुररसभी वातना वाले वातप्रकोपन कर्मको करताहै । (२) शक है अतएव द्रव्य के स्वाभाविक मधुरादि वीर्य, रस और विपाक दोनोंको जीत लेताहै, रस विपाकजनित मधुरादि रसोंके साथ स- | जैले भेसका मांस उष्णवीर्य होनेसे उसके मानफलवाले होते है अब कितने ही द्रव्य । मधुररस और विधाक को जीत लेताह और रसद्वारा कितने ही विपाक द्वारा, कितने इसलिये पित्तको दूषित करदेताहै । ( ३ ) ही वीर्यद्वारा, कितने ही प्रभाव द्वारा शुभ प्रभाव, रस, विपाक और वीर्य तीनों को वा अशुभ कर्म करते हैं जैसे मधुर कषाय जीत लेताहै जैसे अम्लरस विपाक और रसयुक्त होने के कारण पितका शमन | उष्णवीर्यवाली सुरा क्षीरको उत्पन्न करताहै। करता है वहा मधुरकाबपाका हान स यही रसादिका स्वाभाविक बलहै । कफको नष्ट करता है खट्टी कांजी रूक्षता प्रभावका लक्षण । से कफको दूर करती है, इत्यादि । रसादिसाम्थे यत्कर्म विशिष्टं तत्प्रभावजम् । यद्यहव्ये रसादीनां बलवत्येन वर्तते ॥२३॥ __ अर्थ- रसादि की समता होनेपर भी अभिभूयेतरांस्तसत्कारणत्वं प्रपद्यते । जो भिन्न प्रकारका कर्म दिखाई देताहै वह विरुद्धभुणसंयोगे भूयसाऽल्पं हि जीयते ॥ अर्थ-रस,बिपाक, बार्य और प्रभाव प्रभाव जनित होताहै । रसवीर्य और विपाक इनमें से जो जो जिस जिस द्रव्यमें स्थितरह की अपेक्षा अतिशक्ति विशिष्ट जो द्रव्यका ता है वह अन्य दुर्बल रसादिकों का पराभव स्वभावहै उसीको प्रभाव कहते हैं। करके अपने अनुसार कार्य करने में प्रवलहो प्रभावका निदर्शन । जाता है । और जहां परस्पर विरुद्ध गुणवानी रसायैस्तुल्याऽपि चित्रकस्यविरेचनी॥ ले द्रव्योंका संयोग होजाता है वहां वलवान । मधुकस्य च मृदीका घृतं क्षीरस्य दीपनम् । For Private And Personal Use Only
SR No.020075
Book TitleAshtangat Rudaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVagbhatta
PublisherKishanlal Dwarkaprasad
Publication Year1867
Total Pages1091
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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