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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir चिकित्सास्थानं भाषाटीकासमेतम् । (५४५) शीतलरूप ताडके वीजने और कमलके पत्तोंकी पवनोंकरके शीतल किया और देखनेमेंभी मनुष्यको वशीकरण करनेवाला है फिर चाहनेवाले मनुष्य पानकरनेकी कौन कथाहै ॥ २॥ आंबका रस कपूर कस्तूरी करके सुगंधित और प्रकाशित हुई मल्लिकाकरके संयुक्त और गिलोरी पत्थरके प्यालेमें प्राप्त और तरंगोंसे सहित और प्रकाशित और कामदेवकी तरह अंगको धारणकरनेवाले ऐसे मद्यको ॥ ८३ ॥ तालीशआदि चूर्ण तथा रानादि चूर्णको अथवा अवस्थाको स्थापनकरनेवाले मनोहर पदार्थको पहिले भोजन करके पश्चात् लेपित करी पृथवीमें देव दानव आदिके अर्थ जलसे मिले मद्यका दान करके पश्चात् जलका दान करके पश्चात् ॥ ८४ ॥ धृति वाला और स्मृतिवाला और नित्यप्रति नूतन और अधिकपनेसे वर्जितको आचरित करताहुआ और उचित उपचार करके संपूर्णताको उपपादित करताहुआ मनुष्य ॥ ८५ ॥ खिले हुये लाल कमलकी शोभा तिरस्कृतकरनेवाले नेत्रोंके प्रतिबिंबकरके बढी हुई शोभावाला और स्त्रीके मुखकी तरह सुंगधि और भौरोंके गणोंकी हरणकरनेवाली मदिराको पावै ॥ ८६ ॥ पीत्वैवं चषकद्वयं परिजनं सम्मान्य सर्वं ततो गत्वाहारभुवं पुरःसुभिषजो भुञ्जीत भूयोऽत्र चामांसापूपधृतार्ककादिहरितैयुक्तं ससौवर्चलैर्द्विस्त्रिी निशि वाल्पमेव वनितासञ्चालनार्थं पिबेत् ॥ ८७॥ ऐसी मदिराके दो प्यालोका पान करके पश्चात् सब वेश्य, गदिका सन्मान करके और भोजनके स्थानमें जाके शोभन वैद्यके सन्मुख बारंबार भोजन करै और मांस मालपुआ घृत अदरक कालानमक इन्होंकरके संयुक्त मद्यको दो तीन बार दिनमें पीवै और रात्रीमें स्त्रियोंको खुशी करनके अर्थ अल्प मदिराको पावै ॥ ८७ ॥ रहसि दयितामके कृत्वा भुजान्तरपीडनात्पुलकिततनुं जातस्वेदां सकम्पपयोधराम् ॥ यदि सरभसं सीधूदारं न पाययते कृती किमनुभवति क्लेशप्रायं ततो गृहतन्त्रताम् ॥ ८८॥ दोनों बाहुओंके पीडनसे पुलकित शरीरवाली और पसीनासे संयुक्त और कंपते हुये स्तनोंवाली नारीको गोदमें बैठा एकांत स्थानमें मदिराके सरेको नहीं पातित करे तो गृहस्थी मनुष्य किस वास्ते गृहोपकरण अर्थात् गृहस्थसंबंधि सामानों के संपादनसे उपजे क्लेशको सहताहै ॥८॥ वरतनुवत्रासङ्गतिसुगन्धितरंसरकं द्रुतमिव पद्मरागमणिमासवरूपधरम्॥भवति रतिश्रमेण च मदःपिबतोऽल्पमपि क्षयमतनुजौजसपरिहरन् स शयीत परम् ॥ ८९॥ १कुला। - For Private and Personal Use Only
SR No.020074
Book TitleAshtangat Rudaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVagbhatta
PublisherKhemraj Krishnadas
Publication Year1829
Total Pages1117
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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