________________
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra
www.kobatirth.org
Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir
(३३६)
अष्टाङ्गहृदये
सहसा ज्वरसन्तापस्तृष्णा मूर्छा बलक्षयः॥
विश्लेषणं च सन्धीनां मुमूर्षोरुपजायते ॥ १०९ ॥ शीघ्रही ज्वर, संताप, तृषा, मूछ बलका क्षय और संधियोंका मिलाप ये लक्षण मरनेवाले मनुध्यके उपजते हैं ।। ।।१०९॥
गोसर्गे वदनाद्यस्य स्वेदः प्रच्यवंते भृशम् ॥
लेपज्वरोपतप्तस्य दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ ११० ॥ कफज्वरकरके उपतप्त हुये जिसरोगकि मुखसे प्रभातमें अत्यंत पसीना झिरै तिसका जीवना दुर्लभ है ॥ ११० ॥
प्रवालगुलिकाभासा यस्य गात्रे मसूरिकाः॥ उत्पद्याशु विनश्यन्ति न चिरात्स विनश्यति ॥ १११॥ मसूरविदलप्रख्यास्तथा विद्रुमसन्निभाः॥ अन्तर्वक्राः किणाभाश्च विस्फोटा
देहनाशनाः ॥ ११२ ॥ जिसके शरीरमें मसूरके समान अथवा मूंगके समान कांतिवाली फुनसिया उपजकर शीघ्रही नष्ट होजावे, वह मनुष्य शीबही मरजाता है ॥ १११ मसूरका दलके समान आकारवाले और मूंगाके समान कांतिवाले और भीतरको मुखवाले और नेवतीके (घैटा ) समान कांतिवाले विस्फोट देहको नाशते हैं ॥ ११२ ॥
कामलाऽक्ष्णोर्मुखं पूर्ण शङ्खयोर्मुक्तमांसता ॥
सन्त्रासश्चोष्णताऽङ्गे च यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ ११३॥ जिसके नेत्रोंमें कामला रोग हो और पूर्णरूप मुख होवे और जिसकी कनपटियोंमें मांसकी शिथिलता व उद्वेग होवे और अंगमें उष्णता होवे तिसको चिकित्साको वैद्य वार्ज देवै ॥११॥
अकस्मादनुधावच्च विघृष्टं त्वक्समाश्रयम् ॥ (चंदनोशीरमदिराकुणपध्वांक्षगंधयः ॥ शौवालकुकुटशिखाकुंदशालिमयप्रभा ॥ अंतर्दाहा निरूष्माणः प्राणनाशकरा व्रणाः ॥१॥क्षेपकः सार्धश्लोकोयं ॥ ) यो वातजो न शूलाय स्यान्न दाहाय पित्तजः॥ ११४ ॥ कफजो न च पूयाय मर्मजश्च रुजे न यः॥ अचूर्णश्चूर्णकीर्णाभो यत्राऽकस्माच दृश्यते॥११५॥ रूपं शक्तिध्वजादीनां सर्वांस्तान्वर्जयेद्वणान् ॥
For Private and Personal Use Only