SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 595
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir अम्सानिया ५५३ अम्हर्टिया नोबिलिस द्वारा उ सस्व लोयानाम्ल ( Benzoic- समय के समीप या उससे प्रथम, जबकि तापक्रम acid), मॉनोमीथिल अमीन ( Monome- घटने लगा हो, मूत्रस्त्राव होते देखा गया। इससे thylamine) और चुक्रिकाम्ल अर्थात् काष्ठाग्ल पाचन एवं श्रान्त्रिक क्रिया भी बढ़ती हुई देखी (Oxalic acil ) में विश्लेषित हो गई। पुरातन रोगियों में एफीदा का प्रभाव कम जाता है । एफीड्रीन (घुलन बिन्दु वा द्रवणार प्रदर्शित होता है। प्रामवात संबन्धी गृध्रसी तथा ३०° शतांश ) को उत्ताप पहुँचाने पर प्राइसो. अस्थिसोषुम्नकांड प्रदाह के दो रोगियों में तो एफीदीन Isoephedrine (द्रवणांक ११४ ° मुश्किल से कोई प्रभाव उत्पन्न हुा । परन्तु, यहाँ शतांश ) प्राप्त होता है । डॉ० एन० नेगी । पर यह विचारणीय बात है कि उक्त दोनों ए. बल्गेरिस की टहनियों में ३ प्रतिशत अवस्थानों में ऐएिटपाइरिन, सैलिसिलेट ऑफ़ कपायिन होता है। मिस्टर जे० जी० प्रेब्ल सोढा, ऐगिटफेबीन तथा सेनोन इत्यादि औषधे (1८८८). भी लाभ प्रदान करने में असफल रहीं । डॉ. बीक्टीन द्वारा निर्मित काथ की मात्रा प्रयोगांश-जड़ और शुष्क शाम्वाएं । औषध-निर्माण-जड़ का क्वाथ (४० में 1) यह है :-ौषध ३.८५ ग्राम और जल १० ग्राम । मात्रा-प्राधा से १ आउंस । डॉ० कोबर्ट बतलाते है कि एफीडीन ०.२० प्रभाव तथा उपयोग-यह परिवर्तक (रसायन), प्राम की मात्रा में कुक्कुर एवं बिल्ली की शिरा मूग्रल, प्रामाशग बलप्रद और बल्य है (इं मे० में अन्तःक्षेप द्वारा प्रविष्ट किया गया और इससे मे० ) । सर्व प्रथम डाँ० पन नेगी (टोकियो) ने सीबू उरोजना, सार्वा गिक आक्षेप, याच शोध इस बात की ओर ध्यान आकृष्ट की, कि ए. वल्गे- तथा नेत्रकनीनिकाप्रसार उत्पन होते देखा रिस में एफीडीन नामक एक ज्ञारीय सत्व होता गया । है, जिसमें नेग्रकनीनिका-प्रसारक गुण है, श्रम्सुल amsul-पश्चिम घाट. कोकम, भिरण्ड। तथा ऐट्रोपीन (धन्तूरीन) के स्थान में इसका Mangosteen ( Garcinia xanthउपयोग किया जा सकता है। डॉक्टर टी०वी० oxymus, Hook.) फा० इ. १ भा० । बीकटीन ने ध्यान दिलाया कि एक बल्गेरिस देखो-दम्पिल । को जड़ तथा प्रकाण्ड द्वारा निर्मित क्वाथ रूस देशमें प्रामवात, गठिया एवं उपदंश रोग की और अम्सेज amsel-गों. कोकम, भिरण्ड-हिं०। इसके फल का स्वरस श्वासपथ सम्बन्धी रोगों की See-Kokam. प्रख्यात औषध है। | अम्सेल रताम्बिसाल amsel.latāmbisil उग्र तथा पुरातन प्रामवात (Rheuinati- -गो० कोकम की छाल (Garcinia pursm ) के अनेक रोगियों को उक्र क्वाथ puria, bark of-) ई. मे० मे० । फा. का स्वयं व्यवहार कराने के पश्चात् अन्ततः वे इं० १ भा०। इस परिणाम पर पहुँचे कि उक्र पौधा पेशी एवं श्रम्हक amhaq-अ. शुद्ध श्वेत बिना चमक संधि सम्बन्धी उग्र रोगों की प्रधान अमूल्य के जैसे चूने का रंग, गोराचिट्टा । औषध है । इससे व्यथा कम हो जाती है; नाड़ी | अमहदन्दी amha-dandi-पं० श्रोड, चूची-पं०। मन्द तथा कोमल और श्वासोच्छ्वास सरल मेमो०। हो जाता है।५-६ दिनमें तापक्रम स्वस्थ दशा की | श्राम्हर्षिया नोव ल am herstia noble ) तरह हो जाता और संधिशोथ लुप्तप्राय हो जाता | महटिया नोबिलिस am herstia nobiहै। और लगभग १२ दिवस के बाद रोगी lis, Dr. Wall, रोग मुक हो जाता है। कतिपय रोगियों में उस ई०, ले० थौका । ई० है. गा। For Private and Personal Use Only
SR No.020060
Book TitleAayurvediya Kosh Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamjitsinh Vaidya, Daljitsinh Viadya
PublisherVishveshvar Dayaluji Vaidyaraj
Publication Year1934
Total Pages895
LanguageGujarati
ClassificationDictionary
File Size27 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy