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________________ १२५ वर्धमान जीवन-कोश कह व णाणं ? कहं दंसणं से ? सीलंकह णायसुयस्स आसी ? जाणासि णं भिक्खु जहातहेणं, अहासुयं ब्रूहि जहा णिसंतं ॥२॥ खेय ए से कुसले मेहावी, अणंतणाणी य अणंतदसी। जसंसिगो चक्खुपहे ठियस्स, जाणाहि धम्मं च धिइंच पेह ॥ ३ ॥ -सूय०/श्रु १/अ ६/गा १ से ३/ पृष्ठ ३०१ टोका-सः भगवान् चतुस्त्रिंशदतिशयसमेतः खेदः – संसारान्तर्वतिनां प्राणिन कर्मविपाकर्ज दुःखं जानातीति खेदज्ञो दुःखापनोदनसमर्थोपदेशदानात् , यदिवा 'क्षेत्रज्ञो' यथावस्थितात्मस्वरूपपरिज्ञानादात्मज्ञ इति, अथवा-क्षेत्रम्-आकाशं तज्जानातीति क्षेत्रज्ञो लोकालोकस्वरूपपरिज्ञातेत्यर्थः, तथा भावकुशान् - अष्टविधकर्मरूपान् लुनातिछिनतीति कुशलः प्राणिनां कर्मोच्छित्तयेनिपुण इत्यर्थः, आशु-शीघ्र प्रज्ञा यस्यसावाशुप्रज्ञः, सर्वत्र सदोपयोगाद्, न छद्मस्थ इव विचिन्त्य जानातीति भावः महर्षिरिति क्वचित्पाठः, महाश्चासावृषिश्च महर्षिः अत्यन्तोग्रतपश्चरणानुष्ठायित्वादतुलपरीषहोपसर्गसहनाच्चेति, तथा अनन्तम् - अविनाश्यनन्तपदार्थपरिच्छेदकं वा ज्ञान-विशेषग्राहकं यस्यासावनन्तज्ञानी, एवं सामान्यार्थ परिच्छेदकत्वेनानन्तदर्शी, तदेवम्भूतस्य भगवतो यशोनृसुरासुराति शाय्यतुलं विद्यते यस्य स यशस्वी तस्य, लोगस्य 'चक्षुःपथे' लोचनमार्गे भवस्थकेवल्यवस्थायां स्थितस्य, लोकानां सूक्ष्मव्यवहितपदार्थाविर्भावनेन चक्षुर्भूतस्य वा 'जानीहि' अवगच्छ 'धर्म' संसारोद्धरणस्वभावं, तत्प्रणीतं वा श्रुतचारित्राख्यं, तथा तस्यैव भगवतस्तथोपसगितस्यापि निष्प्रकम्पाचारित्राचलन स्वभावां 'धृति' संयमे रति तत्प्रणीतां वा 'प्रेक्षस्व' सम्मक्कुशाग्रीयया बुद्ध्या पर्यालोचयेति, यदिवा-तैरेव श्रमणादिभिः सुधर्मस्वाम्यभिहितो यथात्वं तस्य भगवतो यशस्विनश्चक्षुष्पथे व्यवस्थितस्य धर्म धृति च जानीषे ततोऽस्माकं 'पेहि' त्ति कथयेति । नरक के दुःखों को सुनकरा- संसार के भय से भयभीत बने हुए श्रमण, ब्राह्मण, गृहस्थ और परतीथिकसुधर्मा स्वामी को पूछते थे कि यह एकांत हित को करने वाला प्रधान धर्म-साधु-समीक्षा से किसने कहा है श्री वीर प्रभु का ज्ञान, दर्शन और यम-नियम रूप शील कैसा था ? हे स्वामिन् ! जो जो मैंने पूछा है उसे आप यथातथ्य जानते हो-इसलिये जैसा आपने सुना तथा अवधारण किया-वैसा कहो । ऐसा पूछने पर सुधर्मास्वामी वीर प्रभु के गुण का वर्णन करते हैं ॥२॥ श्री महावीर प्रभु-संसारी जीवों को कर्मों से उत्पन्न हुआ जो खेद-उसके जानने वाले, महर्षि कुशल, अनंत ज्ञानी और अनंत दर्शी थे। ऐसे यशस्वी केवलज्ञानी के धर्म को तुम जानो; वैसे ही उनकी घृति को देखो।(ख) 'उड्ड' अहेयं' तिरिय दिसासु, तसा य जे थावर जे य पागा। 'सेणिच्चणिच्चेहि' समिक्खपण्णे, 'दीवे व धम्म समियं उदाहु ।। -सूय० ८ १/ अ ६/ गा ४/ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.016033
Book TitleVardhaman Jivan kosha Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMohanlal Banthia, Shreechand Choradiya
PublisherJain Darshan Prakashan
Publication Year1984
Total Pages392
LanguageHindi
ClassificationDictionary & Dictionary
File Size24 MB
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